Friday, July 8, 2011

गुलमोहर की छाँव में


 रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
[ केन्द्रीय विद्यालय कटनी मध्य प्रदेश में जुलाई 2001 में गुलमोहर के पेड़ लगवाए थे । ये पेड़ अप्रैल 2005 में खिलने लगे थे ।इन पेड़ों से मेरा बहुत लगाव था । पूर्णिमा वर्मन जी के कहने पर अप्रैल 2006 में यह कविता लिखी गई । आगरा के रेलवे  स्टेशन के वेटिंग रूम में  यह कविता लिखी गई थी जो 16 जून को अनुभूति के गुलमोहर संकलन  में छपी थी ।डायरी कहीं गुम हो गई। अनुभूति में 2006 की रचनाएँ नहीं मिली तो पूर्णिमा जी से निवेदन किया । उन्होंने कल कविता का लिंक भेज दिया ।कटनी फोन करके मैंने इनका हालचाल भी पूछा ।अब आप सबके लिए ]
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु

 गर्म रेत पर चलकर आए,
 छाले पड़ गए पाँव में
आओ पलभर पास में बैठो, गुलमोहर की छाँव में

नयनों की मादकता देखो,
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियाँ भी मुस्काईं हैं
बाहें फैला बुला रहे हैं ,हम सबको हर ठाँव में

चार बरस पहले जब इनको
रोपरोप हरसाए थे
कभी दीमक से कभी शीत से,
कुछ पौधे मुरझाए थे
हर मौसम की मार झेल ये बने बाराती गाँव में

सिर पर बाँधे फूल -मुरैठा
सजधजकर ये आए हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जी भर कर मुस्काए हैं
आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
-0-

24 comments:

  1. गुलमोहर पर आपका यह गीत बहुत भाया। ये वृक्ष नि:संदेह आपको भी याद करते होंगे। ये बोल नहीं सकते लेकिन इनकी गोद में बैठें तो ये अपनी शीतल छाया से सारी थकान मिटा देते हैं। झूमती डालियां हम पर पुष्प-पत्तियाँ बरसा कर खुश होती हैं कि कोई तो आया हमारे पास… इनके पास लगता है, जो स्पर्श की भाषा है, महसूस करने की शक्ति है, वही इन्हें संवेदन शील भी बनाती है। 'मुरैठा' शब्द का प्रयोग बहुत सुन्दर हुआ है।

    ReplyDelete
  2. 'आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हंसे अभाव में'
    कविता की सुन्दरता व सम्पूर्णता बस इस एक पंक्ति में समा गई है ।
    सुधा भार्गव

    ReplyDelete
  3. is rachna ko padhkar aisa ahsaas hua jase in vrkshon se bahut kareeb ka naata hai..

    बाहें फैला बुला रहे हैं ,हम सबको हर ठाँव में

    चार बरस पहले जब इनको
    रोप–रोप हरसाए थे
    कभी दीमक से कभी शीत से,
    कुछ पौधे मुरझाए थे

    Bilkul un nanhe munhon ki trha jinko ham paal poskar bada karte han or kabhi dukh kabhi sukh ki padandiyon par chalte huye jab unko kamyab hua, badha hua dekhte han to hamare sukh ki seema nahi rahti...javab nahi is soch ka...

    ReplyDelete
  4. रामेश्वर जी,
    इस कविता से आपका प्रकृति के प्रति अटूट प्यार झलकता है !
    आखिर इतने प्यार से लिखी कविता गुम कैसे हो सकती है | इसे तो मिलना ही था .....इतनी सुन्दर कविता ...मानो पेड़ बातें कर रहे हों !
    आपकी कलम को नमन !
    हरदीप

    ReplyDelete
  5. मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में

    बहुत सुन्दर भाव लिए सार्थक रचना ..

    ReplyDelete
  6. प्रकृति से लगाव को दर्शाता अच्छा गीत है |

    ReplyDelete
  7. hamesha se hi mujhe ye pred bahut pasand hai jab aapko amaltas ki kavita padhi thi tab soch rahi thi kash gulmohar pr bhi hoti aur aaj aapne padhvadi .kitna sukhad hai ye .

    मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
    bahut hi pyara geet hai .geet likhne me aap nipun hai vaese ye kahan uchit na hoga aapto kavita ki har vidha me nipun hai
    bahut bahut badhai
    saader
    rachana
    -0-

    ReplyDelete
  8. सिर पर बाँधे फूल -मुरैठा
    सज–धजकर ये आए हैं
    मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में

    बहुत सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  9. हर मौसम की मार झेल ये बने बाराती गाँव में ।
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
    bahut arthpurn hai
    bhut achha laga
    bhut bhut badhai
    sadar
    ऋता

    ReplyDelete
  10. हर मौसम की मार झेल ये बने बाराती गाँव में ।
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में… सच में जीवन का दर्शन छुपा है इन पंक्तियों में… बहुत मनमोहक रचना… जी में आता है कि फ़िर से छोटे बच्चे बन जाएं और जोर जोर से गाएं …गर्म रेत पर चलकर आए,
    छाले पड़ गए पाँव में
    आओ पलभर पास में बैठो, गुलमोहर की छाँव में ।

    ReplyDelete
  11. पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया. अत्यन्त सुन्दर रचना... एक एक पंक्ति मन को छू गयी. काव्यात्मकता एवं लयात्मकता दोनों ही अद्भुत हैं.

    गर्म रेत पर चलकर आए,

    छाले पड़ गए पाँव में

    आओ पलभर पास में बैठो,

    गुलमोहर की छाँव में ।

    पूरा का पूरा जीवन दर्शन इन चार पंक्तियों में व्यक्त हो गया है.

    मौसम के गर्म थपेड़ों में

    जी भर कर मुस्काए हैं

    आओ हम इन सबसे पूछें -

    कैसे हँसे अभाव में

    ReplyDelete
  12. प्रणाम !
    बेहद सुंदर भाव लिए . एक गुलमोहर सी कविता है मसलन एक सुकून देती
    सिर पर बाँधे फूल -मुरैठा
    सज–धजकर ये आए हैं
    मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
    वाकई बेहद प्रभावी
    बधाई
    सादर

    --

    ReplyDelete
  13. प्रणाम !
    बेहद सुंदर भाव लिए . एक गुलमोहर सी कविता है मसलन एक सुकून देती
    सिर पर बाँधे फूल -मुरैठा
    सज–धजकर ये आए हैं
    मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में
    वाकई बेहद प्रभावी
    बधाई
    सादर

    ReplyDelete
  14. आपके इस सुन्दर पोष्ट की चर्चा कल मंगलवारीय चर्चामंच पर भी आप आकर अपने सुझावों से अवगत कराएं लिंक- http://charchamanch.blogspot.com/

    ReplyDelete
  15. सुन्दर रचना बधाई

    ReplyDelete
  16. गुलमोहर व अमलतास दोनों ही गीत मधुर हैं ।

    ReplyDelete
  17. बहुत अच्छी रचना । शुभकामनाएँ ।

    ReplyDelete
  18. पेड़ हमेशा सुखदायी और मनभावन होते हैं। फूलों से लदे गुलमोहर के तो कहने ही क्या! आपका गीत भी वैसा ही खूबसूरत है।

    ReplyDelete
  19. jeevant kavita
    sanvedana ki sarita

    ReplyDelete
  20. jeevant kavita
    sanvedna ki sarita
    saadar
    rekha rohatgi

    ReplyDelete
  21. Kamboj bhai,
    bahut komal aur bhaavpurn rachna hai. gulmohar ke ped ko dekhna aur inke fool se saje rahon par chalna bahut sukhad hai. jab kabhi aap wahan jaayenge to wo ped aapko apna sa lagega, jaise aapse batiyata ho. bahut arthpurn shabd jo sandesh bhi hai...
    मौसम के गर्म थपेड़ों में
    जी भर कर मुस्काए हैं
    आओ हम इन सबसे पूछें -कैसे हँसे अभाव में

    bahut badhai.

    ReplyDelete
  22. भाईसाहब आज मैं आपका यह गीत पढ़ पाई हूँ. पेड़, फूल और वन हमेशा मेरे दिल के बहुत करीब रहें हैं और आज यह सुंदर गीत पढ़ कर मन भाव बिभोर हो गया आनन्दित हो गया कुछ पल को लगा मैं गुलमोहर से ही बतिया रही हूँ. बहुत सुंदर गीत है.
    सादर,
    अमिता

    ReplyDelete