Wednesday, July 6, 2011

अमलतास के झूमर



        रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

धरती तपती लोहे जैसी
गरम थपेड़े लू भी मारे।
अमलतास तुम किसके बल पर
खिल-खिल करते बाँह पसारे।

पीले फूलों के गजरे तुम
भरी दुपहरी में लटकाए।
चुप हैं राहें, सन्नाटा है
फिर भी तुम हो आस लगाए।

कठिन तपस्या करके तुमने
यह रंग धूप से पाया है।
इन गजरों को उसी धूप से
कहकर तुमने रंगवाया है।

इनके बदले में पत्ते भी
तुमने सबके सब दान किए।
किसके स्वागत में आतुर हो
तुम मिलने का अरमान लिये?

तुझे देखकर तो लगता है-
जो जितना तप जाता है।
इन सोने के झूमर जैसी
खरी चमक वही पाता है।

जीवन की कठिन दुपहरी में
तुझसे सब मुस्काना सीखें।
घूँट-घूँट पी रंग धूप का
सब कुंदन बन जाना सीखें।
-0-

15 comments:

  1. कठिन तपस्या करके तुमने
    यह रंग धूप से पाया है।
    इन गजरों को उसी धूप से
    कहकर तुमने रंगवाया है।
    बहुत सुन्दर लगी ये पंक्तियाँ! अमलतास के झूमर के चित्र के साथ साथ बेहद ख़ूबसूरत रचना लिखा है आपने ! आपकी लेखनी को सलाम!

    ReplyDelete
  2. तुझे देख कर तो लगता है
    जो जितना तप जाता है
    इन सोने की झूमर जैसी
    खरी चमक वही पाता है|

    jeevan ka kathor satya yahi hai.
    itni sunder abhivyakti
    bahut achha laga.

    ReplyDelete
  3. पीले फूलों के गजरे तुम
    भरी दुपहरी में लटकाए।
    चुप हैं राहें, सन्नाटा है
    फिर भी तुम हो आस लगाए।

    bahut khoobsoorat...meri badhayi...

    ReplyDelete
  4. बहुत सुन्दर रचना... बधाई

    ReplyDelete
  5. बहुत मोहक और सशक्त रचना. ज़िन्दगी की बहुत गहरी समझ से कैसे नाता जुड़ जाता है...
    तुझे देखकर तो लगता है-
    जो जितना तप जाता है।
    इन सोने के झूमर जैसी
    खरी चमक वही पाता है।
    सच है जीवन में तपकर हीं मनुष्य भी श्रेष्ठ बन पाता है. बहुत बधाई उत्कृष्ट रचना केलिए काम्बोज भाई.

    ReplyDelete
  6. पीले फूलों के गजरे तुम
    भरी दुपहरी में लटकाए।
    चुप हैं राहें, सन्नाटा है
    फिर भी तुम हो आस लगाए।
    kitna sunder manvi karan hai amltas pr itni achchhi kavita mene nahi padh bahut abhut badhai
    saader
    rachana

    ReplyDelete
  7. जीवन की कठिन दुपहरी में
    तुझसे सब मुस्काना सीखें।
    घूँट-घूँट पी रंग धूप का
    सब कुंदन बन जाना सीखें।

    बहुत सुन्दर ..अमलतास से अच्छी सीख देती सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  8. जीवन की कठिन दुपहरी में
    तुझसे सब मुस्काना सीखें।
    घूँट-घूँट पी रंग धूप का
    सब कुंदन बन जाना सीखें।

    Bahut hi Sunder....

    ReplyDelete
  9. पलाश के बाद अमलतास पर आपकी रचना बहुत अच्छी लगी। गुलमोहर पर हो तो वह भी पेश कीजिए।

    ReplyDelete
  10. 'अमलतास के झूमर' एक बेहद खूबसूरत दिल को छूने वाली कविता लगी। ये पंक्तियां तो स्चमुच कमाल की हैं-
    तुझे देखकर तो लगता है-
    जो जितना तप जाता है।
    इन सोने के झूमर जैसी
    खरी चमक वही पाता है।

    ऐसी प्रेरक और सच्ची बात को कविता में अमलतास के बहाने आपने कितनी सहजता से कह दिया है ! बधाई !!

    ReplyDelete
  11. ये पंक्तियाँ तो बस कमाल हैं-

    पीले फूलों के गजरे तुम
    भरी दुपहरी में लटकाए।
    चुप हैं राहें, सन्नाटा है
    फिर भी तुम हो आस लगाए....

    अच्छी सीख देती सच्ची बात को आपने कितनी सहजता से कह दिया है !
    आस है तो जीवन है....

    ReplyDelete
  12. यूँ तो आपकी सभी रचनाएँ सुन्दर होती है उनमें सदैव ही कुछ अनूठा प्रयोग होता है लेकिन यह रचना तो आपकी श्रेष्ठतम रचनाओं की श्रेणी में रखने योग्य है

    यह पंक्तियाँ तो गुलजार जी के गीतों सी लगती हैं...

    पीले फूलों के गजरे तुम
    भरी दुपहरी में लटकाए।
    इन गजरों को उसी धूप से
    कहकर तुमने रंगवाया है।
    घूँट-घूँट पी रंग धूप का .....

    ReplyDelete
  13. वाह साहब, पलाश और अमलतास की तरह गुलमोहर भी लाजवाब है।

    ReplyDelete
  14. तुझे देखकर तो लगता है-
    जो जितना तप जाता है।
    इन सोने के झूमर जैसी
    खरी चमक वही पाता है।

    गहन भाव समेटे बेहद खूबसूरत अभिव्यक्ति. आभार.
    सादर,
    डोरोथी.

    ReplyDelete