Sunday, June 5, 2011

क्षणिकाएँ



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
डरीडरी आँखों में
तिरते अनगिन आँसू
इनको पोंछो
वरना जग जल जाएगा ।
2
उम्र तमाम
कर दी हमने
रेतीले रिश्तों के नाम ।
3
औरत की कथा
हर आँगन में
तुलसी चौरेसी
सींची  जाती रही व्यथा ।
4
स्मृति तुम्हारी-
हवा जैसे भोर की
अनछुई , कुँआरी ।
5
माना कि
झुलस  जाएँगे हम,
फिर भी सूरज को
धरती पर लाएँगे हम ।
-0-

11 comments:

  1. आपकी ये क्षणिकायें बढ़िया लगी। अन्तिम क्षणिका में जो आत्मविश्वास है, वह अब कहाँ दीखता है ! बेहतर आदमी के लिए बेहतर दुनिया बनाने/संजोने का यह आत्म विश्वास आदमी में मरना नहीं चाहिए।

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  2. सुंदर क्षणिकाएं.

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  3. हर क्षणिका गहन भाव लिए हुए

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  4. माना कि
    झुलस जाएँगे हम
    फिर भी सूरज को
    धरती पर लाएँगे हम ।
    -0-bahut shaandaar chandikayen badhaai sweekaren.

    please visit my blog.thanks

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  5. उम्र तमाम
    कर दी हमने
    रेतीले रिश्तों के नाम ।
    3
    औरत की कथा
    हर आँगन में
    तुलसी चौरे–सी
    सींची जाती रही व्यथा ।
    बहुत सुन्दर क्षणिकायें हैं बधाई।

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  6. डरी–डरी आँखों में
    तिरते अनगिन आँसू
    इनको पोछो
    वरना जग जल जाएगा
    bhaiya ek kavya likha ja sakta hai itne gahre bhav hain
    स्मृति तुम्हारी
    हवा जैसे भोर की
    अनछुई , कुँआरी ।
    bahut sunder
    badhai
    saader
    rachana

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  7. सुंदर क्षणिकाएं....
    उम्र तमाम
    कर दी हमने
    रेतीले रिश्तों के नाम ।

    कोई गम नहीं
    रेतीले ही सही
    वो रिश्ते तो हैं ....
    हम अकेले नहीं
    नाम के ही सही
    वो रिश्ते तो हैं .....
    उम्र भर प्यार
    दिया है जिनको
    वो रिश्ते तो हैं .....
    प्यार आँचल में
    भीग जाएँगे जब
    ये रेतीले रिश्ते .....
    प्यार ही प्यार
    बरसाएँगे ये
    रेतीले रिश्ते !

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  8. माना कि
    झुलस जाएँगे हम,
    फिर भी सूरज को
    धरती पर लाएँगे हम ।

    ye to bhav to bahut pasnd aaye kaash aisa hi sab soch paate to asafal jahghon par bhi saflta unke kadm chumti...bahut2 badhai itne aatmvishvash ke liye...

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