Thursday, June 2, 2011

नींव के पत्थर

मंजु मिश्रा , कैलिफ़ोर्निया

नींव के पत्थर
दिखते नहीं,
 सहते हैं, सारा बोझ
इमारत का.
और दरवाज़े, खिड़की,कँगूरे
बस यूँ ही इतराते रहते हैं  ।                                                                                                         *मंजु मिश्रा जी की और अधिक कविताएँ 'मनुकाव्य' पर पढ़ें ।

14 comments:

  1. कम शब्दों में सारगर्भित पोस्ट , आभार

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  2. छोटी सी लाइने बहुत कुछ कह रही है...

    प्रेम रस

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  3. इतनी छोटी कविता में कितनी बड़ी बात कह गई हैं मंजु जी ! बहुत सुन्दर कविता है! बधाई !

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  4. नींव के पत्थर
    दिखते नहीं,
    सहते हैं, सारा बोझ
    इमारत का.gaharai liye hue kam aur saral shabdon main saarthak post.


    please visit my blog.thanks.

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  5. CHAND SHABD ZINDGI KE BAHUT BADE SACHHAI KO UJAAGAR KAR GAI.

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  6. क्या बात है, बहुत ऊँची बात, कम शब्दों मे.

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  7. बहुत ही गहरे भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार कविता लिखा है आपने!

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  8. सहज साहित्य एवं सभी पाठकों का हार्दिक आभार...

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  9. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (04.06.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.blogspot.com/
    चर्चाकार:-Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)
    स्पेशल काव्यमयी चर्चाः-“चाहत” (आरती झा)

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  10. कुछ शब्दों में बहुत कुछ कह दिया..बहुत सुन्दर रचना..

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