Thursday, June 16, 2011

मन का दर्पन -2 [चोका]


रामेश्वर काम्बोज हिमांशु’
भरम हुआ
यह न जाने कैसे
दरक गया
है मन का दर्पन ।
धुँधले नैन
ये देख नहीं पाए
कौन पराया
कहाँ अपनापन ?
मुड़के देखा-
थी  पुकार वो चीन्हीं
पहचाना था
प्यारा-सा सम्बोधन ।
धुली उदासी
पहली बारिश में
धुल जाता ज्यों
धूल-भरा आँगन ।
आँसू नैन में
भरे थे डब-डब
बढ़ी हथेली
पोंछा हर कम्पन ।
थे वे अपने
जनम-जनम के
बाँधे हुए थे
रेशम-से बन्धन ।
प्राण युगों से
हैं इनमें अटके
यूँ ही भटके
ये था पागलपन ।
तपता माथा
हो गया शीतल
पाई छुअन
मिट गए संशय
मन की उलझन ।
-0-

10 comments:

  1. आँसू नैन में
    भरे थे डब-डब
    बढ़ी हथेली
    पोंछा हर कम्पन ।
    थे वे अपने
    जनम-जनम के
    बाँधे हुए थे
    रेशम-से बन्धन ।
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ! दिल को छू गयी! शानदार और उम्दा प्रस्तुती!

    ReplyDelete
  2. धुली उदासी
    पहली बारिश में
    धुल जाता ज्यों
    धूल-भरा आँगन ।
    Bahut khubsurti se udasi ka varnan kiya hai sabhi rachnaye eakse badhkar eak hai... hardik badhai..

    ReplyDelete
  3. धुली उदासी
    पहली बारिश में
    धुल जाता ज्यों
    धूल-भरा आँगन ।
    bahut sunder
    तपता माथा
    हो गया शीतल
    पाई छुअन
    मिट गए संशय
    मन की उलझन ।
    kamal ka likha hai apno ka sparsh matr asim aanand deta hai .
    bahut khub is vidha ke bhi maharathi hain aap
    saader
    rachana

    ReplyDelete
  4. इन चौकों में भी कोई बात है जो दिल को छूती है, भाई साहब आप तो कमाल कर रहे हैं। इतने सुन्दर साहित्यिक प्रयोग करके दिखला रहे हैं कि अपने मन की सच्ची अभिव्यक्ति ऐसे भी संभव है। बहुत सुन्दर!

    ReplyDelete
  5. बहुत खूबसूरत चोका है...मन को छू जाने वाला...मेरी बधाई...।
    प्रियंका

    ReplyDelete
  6. बहुत सुन्दर लिखा है.. सुन्दर रेशम से रिश्ते

    ReplyDelete
  7. तपता माथा
    हो गया शीतल
    पाई छुअन
    मिट गए संशय
    मन की उलझन ....
    बहुत ही सुन्दर चोका ....लाजवाब...नि:शब्द कर दिया ....

    ReplyDelete
  8. दरक गया मन का दर्पण.......
    बहुत सुंदर रचना
    bahut-kuch.blogspot.com

    ReplyDelete
  9. man ko chhuti panktiyaan.badhaai.

    ReplyDelete