Monday, May 9, 2011

नील कुवलय -से नयन



नील कुवलय -से नयन
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

नील कुवलय -से
तुम्हारे
ये अधमुँदे नयन
कितने पावन
बुनते सपन 
डूबे मदिर
कल्पना के रंग में
और गहरी झील -सा
अपना यह मन ।
भोर की स्वर्ण किरने
लगी मुख चूमने,
आज फिर भी
ये नयन हैं अनमने
लहर -सुधियाँ
कई जन्मों से जुड़ी
रूप का कर रही
अनवरत आचमन ।

 फिर जनम
मिला हमें
तो फिर मिलेंगे ,
अधखिले ये कमल
फिर-फिर खिलेंगे
भूल नहीं पाया
अभी तक
उर यह आकुल
मृदु  स्पर्श
तरल स्मित की चितवन।

20 comments:

  1. डूबे मदिर

    कल्पना के रंग में

    और गहरी झील -सा

    अपना यह मन ।
    कितनी रंगबिरंगी हैं ये कल्पनायें कि हर शब्द की रश्मि किरणे हम तक पहुँच गयी। बहुत सुन्दर रचना। बधाई आपको।

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  2. बहुत ही अच्छी रचना है

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  3. बहुत सुन्दर रचना

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  4. बहुत सुन्दर रचना

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  5. बहुत ही कोमल भाव लिए हुए है यह कविता तो !

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  6. भोर की स्वर्ण किरने
    लगी मुख चूमने,
    आज फिर भी
    ये नयन हैं अनमने
    बहुत सुंदर ....

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  7. bahut pyari kavita. man ko mohit kar dene wale shabd aur bhaav, bahut badhai kamboj bhai.

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  8. सुन्दर भाव और सुन्दर शब्द… इन छोटी छोटी कविताओं में जिस ढंग से आपने पिरोये हैं, वह देखते ही बनता है। सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  9. फिर जनम
    मिला हमें
    तो फिर मिलेंगे ,
    अधखिले ये कमल
    फिर-फिर खिलेंगे
    bhavon ki manjari hai kya hi sunder
    डूबे मदिर
    कल्पना के रंग में
    और गहरी झील -सा
    अपना यह मन ।
    bhaiya aapki lekhni ki tarah aapka man bhi bahut pavitr hai .jan man pavan ho to kavita bhi nilmal ganga si bahti hai .sabhi komal bhavon ki kavita
    saader
    rachana

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  10. सुन्दर भाव और सुन्दर शब्द चयन ...सुन्दर रचना

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  11. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    http://charchamanch.blogspot.com/

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  12. फिर जनम

    मिला हमें

    तो फिर मिलेंगे ,

    अधखिले ये कमल

    फिर-फिर खिलेंगे
    uttam soch
    डूबे मदिर

    कल्पना के रंग में

    और गहरी झील -सा

    अपना यह मन ।
    komal soch aapko shbdo ka jadugar kahna galat na hoga .thode se shbdon me bhavon ko kaese bahaya jaye koi aap se sikhe
    badhai
    rachana

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  13. amita kaundal17 May, 2011 05:05

    बहुत सुंदर रचना है पर यह पंक्तियाँ बहुत अच्छी लगीं
    भोर की स्वर्ण किरने
    लगी मुख चूमने,

    आज फिर भी

    ये नयन हैं अनमने



    बहुत सुंदर शब्द हैं

    बधाई

    सादर,

    अमिता कौंडल

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  14. फिर जनम
    मिला हमें
    तो फिर मिलेंगे ,
    अधखिले ये कमल
    फिर-फिर खिलेंगे ......
    अधखिले कमल... मन की अधूरी कामनाएँ.... एक आशा जगाती हैं मन में... एक नए जीवन की ... फ़िर से जीने की....
    सुन्दर रचना के लिए बधाई

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  15. सुन्दर रचना
    भावप्रवण

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  16. सुन्दर भाव, सुन्दर शब्द, सुन्दर अभिव्यक्ति

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  17. ek komal sunder bhaav liye pyaari si kavita bahut achchi lagi.first time aapke blog par aai hoon.padhkar achcha laga.i m following ur blog.

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  18. इन्द्रधनुषी अभिव्यक्ति.......

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  19. डूबे मदिर
    कल्पना के रंग में
    और गहरी झील -सा
    अपना यह मन ।

    Bahut gahri abhivykati se ot-prot aapki rachna ke liye hardika badhai..

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