Sunday, May 1, 2011

ताँका गीत


 रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

थके न काँधे
कभी बोझ से किसी
दूर आ गया ,
तुम्हारे आँसुओं में
डूबा पाहन -मन । 1

पारदर्शी है-
तुम्हारा आचरण,
शुभ चिन्तन,
लोग देते ठोकरें
कितने हैं निर्मम ! 2

रोया नहीं मैं
कि पथ में शूल हैं,
नहीं झिझका
कि नभ में धूल है
या है कोई चुभन ।3

हों नैन गीले
टिका लो  माथा यह
काँधे पे मेरे
प्रतिकूल है जग
मैं करूँगा सहन ।4

उसी ताप से-
पिंघल ,मैं जी लूँगा
खारे ही सही
भर ओक पी लूँगा
करके आचमन ।5

पास होते जो
तुम ,सब जानते
पहचानते
मैं भी रोया ,मानते
प्यार,अपनापन ।6

प्राण हो मेरे
अब न रोना कभी
आँसू तुम्हारे
हैं सागर पे भारी
घुमड़ते ये घन ।7

बहा जो नीर
कह गया था पीर
मैं था अधीर
बींध गया था मन
अधरों का कम्पन ।8

लो पोंछ  आँखें
गर्म जल में जग
जाएगा जल
ऐसा चढ़ेगा ज्वार
डोलें धरा -गगन ।9

मोती ये तेरे
इनको खोना नहीं
यूँ रोना नहीं
लोग चाहते नहीं-
खिले कोई चमन ।10
 -0-

15 comments:

  1. pahli baar main taanka padh rahi, jaise haaiku bhi pahli baar aapse hin samjhi. sabhi haaiku bahut bhaavpurn...
    रोया नहीं मैं
    कि पथ में शूल हैं,
    नहीं झिझका
    कि नभ में धूल है
    या है कोई चुभन

    bahut shubhkaamnaayen aur badhai kamboj bhai.

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  2. बहा जो नीर, कह गया था पीर, मैं था अधीर, बींध गया था मन, अधरों का कम्पन,
    मर्मस्पर्शी रचना…
    छंद का बंधन भी, रोक ना पाया, भावों की उमड़न्…
    कल कल छल छल कर, बहती जा रही है नदी तांका की।

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  3. यहाँ तो भावों की पवित्र बहती जा रही है और मन उनमें डूबता चला जा रहा है |
    मन के भावों को अक्षरों की माला में पिरोना तो कोई आपसे सीखे !
    जब कुछ और कहने को शब्द न मिलें तो एक ही शब्द सब कुछ कह देता है ....
    वाह ! वाह !
    मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन ।
    आखिरी ताँका के जवाब में कुछ ऐसा कहा जा सकता है ...
    आँसू जो मेरे
    बन गए थे मोती
    लिए सँभाल
    जब साथ रब हो
    लोगों की क्या मज़ाल !

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  4. यहाँ तो भावों की पवित्र धारा बहती जा रही है और मन उनमें डूबता चला जा रहा है |
    मन के भावों को अक्षरों की माला में पिरोना तो कोई आपसे सीखे !
    जब कुछ और कहने को शब्द न मिलें तो एक ही शब्द सब कुछ कह देता है ....
    वाह ! वाह !
    मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन ।
    आखिरी ताँका के जवाब में कुछ ऐसा कहा जा सकता है ...
    आँसू जो मेरे
    बन गए थे मोती
    लिए सँभाल
    जब साथ रब हो
    लोगों की क्या मज़ाल !

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  5. हों नैन गीले
    टिका लो माथा यह
    काँधे पे मेरे
    प्रतिकूल है जग
    मैं करूँगा सहन ।
    shbd hai ki bhavna ki bunden.
    man ke aangan me chham se kuden.

    थके न काँधे
    कभी बोझ से किसी
    दूर आ गया ,
    तुम्हारे आँसुओं में
    डूबा पाहन -मन ।
    aansun ki mar jeevan bhar yad rahti hai pr kabhi kabhi man patthar ho jata hai ya karna padta hai
    is anmol khajane ke keliye kuchh bhi likhna mushkil hai.ambhavan
    saader
    rachana

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  6. मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन ।

    is rachna ke liye mere paas shabd nahi han...lagta ha logon ki soch ko kore page par ukerkar jase unko hakikat ki paridhi men la khada kiya ....bahut2 badhai...

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  7. आपकी कलम से निकले ये ताँका गीत अनुपम हैं। आपका यह अनुपम सृजन निश्च्य ही नये लोगों में प्रेरणा फूंक रहा है… बधाई !

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  8. अद्भुत रचना !! बहुत ही सुन्दर भाव, "आँसू तुम्हारे हैं/ सागर पे भारी" "मोती ये तेरे / इनको खोना नहीं/ यूँ रोना नहीं"

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  9. aadarniy sir
    kya likhun-----
    aapki xhanikaon neto man ke tar-tar baja diye
    sari ki saari xhanikaye laybaddh si hokar ek dhara me baha le gai .aur main usme dubti utrati chali gai.
    bahut hi behatreen
    ,shabdo ki moti aisi chuni
    jaise koi nageena
    kisi ek ki kya baat karun
    har xhanikaye de rahi prerana.
    bahut hi badhiya prastuti
    hardik abhinadan
    avam sadar naman
    poonam

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  10. रोया नहीं मैं
    कि पथ में शूल हैं,
    नहीं झिझका
    कि नभ में धूल है
    या है कोई चुभन ।3
    जीवन की सही राह दिखाती पंम्क्तियाँ।
    मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन ।
    पूरा गीत बहुत सुन्दर है। कम्बोज भाई ये ताँका गीत क्या होता है पहली बार सुना है। क्या इसके बारे मे भी कुछ बतायेंगे।? शुभकामनायें।

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  11. बहुत सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ आपने लाजवाब रचना लिखा है जो काबिले तारीफ़ है! बधाई!

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  12. amita kaundal12 May, 2011 23:18

    एक एक शब्द को बहुत ही सुन्दरता से भावों में पिराया है. आपकी हर एक रचना से बहुत कुछ सीखती हूँ मैं. आंसुयों को अलग अलग भावों में बहुत सुंदर बांधा है आंसू सागर से भारी भी हैं और यही आंसू अनमोल मोती भी हैं. बहुत सुंदर लिखा है रामेश्वर भैया.
    प्राण हो मेरे
    अब न रोना कभी
    आँसू तुम्हारे
    हैं सागर पे भारी
    घुमड़ते ये घन

    मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन

    सादर
    अमिता कौंडल

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  13. amita kaundal14 May, 2011 09:46

    एक एक शब्द को बहुत ही सुन्दरता से भावों में पिराया है. आपकी हर एक रचना से बहुत कुछ सीखती हूँ मैं. आंसुओं को अलग- अलग भावों में बहुत सुंदर बांधा है आंसू सागर से भारी भी हैं और यही आंसू अनमोल मोती भी हैं. बहुत सुंदर लिखा है रामेश्वर भैया.

    प्राण हो मेरे
    अब न रोना कभी
    आँसू तुम्हारे
    हैं सागर पे भारी
    घुमड़ते ये घन

    मोती ये तेरे
    इनको खोना नहीं
    यूँ रोना नहीं
    लोग चाहते नहीं-
    खिले कोई चमन

    सादर
    अमिता कौंडल

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  14. शब्दों के मोतियों से सजी यह माला ,भाव सरिता बन जो उमड़ी ,उमड़ती ही चली गयी। बहा गयी प्यार ,विरह और सांत्वना की त्रिवेणी। कितनी गहराई में डूबकर रची गयी है यह रचना। काव्य जगत को सुंदर रचना से माला माल करने वाली। वधाई रामेश्वर जी। पहली बार आप का लिखा कुछ पढ़ा। भाव विभोर हुई।

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  15. बहुत ही सुंदर सृजन

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