Saturday, April 2, 2011

मुक्तक



आज रिश्तों का हिसाब मत देखो
मैंने क्या लिखा ज़वाब मत देखो ।
हर वर्क पर है सिर्फ़  तेरा नाम ,
खोलकर दिल की क़िताब मत देखो॥
-0-
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

14 comments:

  1. वाह ! पढ़ते ही अनायास यही निकला...बहुत सुन्दर रचना है...।

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  2. Dr. Rama Dwivedi...
    क्या बात है हिमांशु जी ...बहुत सच कहा है आपने ...बधाई ...
    नए संवत्सर युगादि की मंगलकामनाएं ...

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  3. वाह! क्या खूब!

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  4. हिमांशु जी ,
    बहुत ही प्यारी रचना है .....
    हर अक्षर दिल को छू गया !
    मार्मिक रचना के लिए बधाई !
    इस मुत्तक के जवाब में कुछ कहना कहती हूँ .....

    सीख लिया ये जिस दिन हमने
    बिन हिसाब रिश्ते निभाना
    देखना फिर उस दिन तुम
    कुछ और ही होगा यह ज़माना !
    हरदीप

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  5. बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना ! रिश्ते तो होते ही सँवारने के लिए हैं, उनके बीच हिसाब किताब की गुंजाइश नहीं होती, जो, बदले में क्या मिला की नाप तौल पर चले वो रिश्ते नहीं व्यावहारिकता है.

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  6. भाई हिमांशु जी, बहुत प्यारा मुक्तक है। इस मुक्तक के जवाब में हरदीप जी ने भी जो अपनी टिप्पणी में पंक्तियाँ कही है, वे भी लाजवाब हैं।

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  7. Bahut khubsurat mukatk "riste" par likha ha bahut-2 badhai..sach risto men judav hona chiye hisaab kitaab nahi..

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  8. kitna sunder bhavo se bhara muktak hai anand aaya
    badhai ho
    saader
    rachana

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  9. aadar niy sir
    bahut bahut hi achhi lagi aapki likhi muktak avam sindar bhavnao ki abhvykti.
    bahut bahut badhi
    sadar dhanyvaad
    poonam

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  10. हर वर्क पर है सिर्फ़ तेरा नाम ,खोलकर दिल की क़िताब मत देखो॥

    वाह, वाह | क्या अंदाजे बयां है !

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