Friday, March 11, 2011

द्वार से लौटा याचक


रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

द्वार से  लौटे
याचक के दर्द को
कोई लिखता नहीं
सिन्धु-सा गहरा  भी हो
पर दिखता नहीं।
कौन जानेगा-
खाली झोली निहार
वह कितना रोया होगा !
आँसू छिपाने की कोशिश में
चेहरा कितना धोया होगा !
-0-
4 फ़रवरी ,2011

10 comments:

  1. वाह! बहुत शानदार...

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  2. बहुत दर्द भरा है हर एक शब्द में....

    याचक को हम
    अजीब सी
    नज़र से हैं देखते
    उस को भी
    कोई दर्द होगा
    यह तो कभी नही
    हैं सोचते....

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  3. is vishya me to shayad hi kisine socha hoga .aapne socha aur itna sunder likha aapko bahut bahut badhai
    saader
    rachana

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  4. हर एक शब्द से दर्द के आँसू छलक रहे हैं। दिल को छू गयी रचना।

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  5. एक याचक के दर्द को बड़ी ही गहराई से उकेरा है !
    आभार !

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  6. बेहतरीन ……………याचक के दर्द को बखूबी उतार दिया।

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  7. बहुत ही बढ़िया ..... गहन अभिव्यक्ति

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  8. aadaarniy sir
    bahut hi marm-sparshi tatha dil ko jhakjhor dene wali aapki postkahi aansu bhi chhalka gai.
    behtreen
    poonam

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  9. द्वार से लौटे / याचक के दर्द को / कोई लिखता नहीं
    सिन्धु-सा गहरा भी हो / पर दिखता नहीं।
    कौन जानेगा- / खाली झोली निहार / वह कितना रोया होगा !
    आँसू छिपाने की कोशिश में / चेहरा कितना धोया होगा !

    दिल कू छू गयी इस रचना में व्यक्त पीड़ा. जानते हम सभी हैं, लेकिन शायद जब पीड़ा किसी और की हो तो हम अक्सर असंवेदनशील हो जाते हैं. वरना कौन नहीं जानता कि कुछ मांगने से पहले मांगने की लज्जा कितनी दारुण होती है, कितनी बार पांव पीछे खींचती है आत्मा! लेकिन विवशता ही है जो याचक बना देती है. याचना के बोझ से झुकी नज़रें अगर पढ़ी जातीं तो शायद कोई किसी याचक को खाली हाथ नहीं लौटाता. अपनी सामर्थ्य अनुसार झोली भरने में अपना योगदान अवश्य करता. उत्कृष्ट रचना के लिए बधाई.

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  10. eakda achuti rachna hai hai ye jo dil ki gaharai se nikli hai...bahut gahare dard ka aabas karati ye rachna bahut kuch kahti hai...

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