Thursday, February 17, 2011

भटका मेघ



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1
दु:ख हैं बड़े
गली-चौराहे पर
युगों से खड़े
2
पुरानी यादें-
सुधियों की पावस
भीगा है मन
3
नम हैं आँखें
बिछुड़ गया कोई
छूकर छाया
4
बेबस डोर
बाँधे  से नहीं बँधे
लापता छोर ।
5
भटका मेघ
धरती को तरसे
तभी बरसे





                                      
6
सिसकते मन को
उड़ा पखेरू



7
रड़कें नैन
छिन गई निंदिया
मन का चैन
8
याद तुम्हारी
छल-छल छलकी
बनके आँसू
9
झील उफ़नी
जब बिसरी यादें
घिरीं बरसीं
-0-




20 comments:

  1. दु:ख हैं बड़े
    गली-चौराहे पर
    युगों से खड़े

    सही कहा ...
    कई बार अपने आस पास देखती हूँ तो
    यही एहसास होता है...


    पंखों में बाँध
    सिसकते मन को
    उड़ा पखेरू

    मौन हूँ ....
    कितने कम शब्दों में
    छू गईं दिल को .....
    .....

    ReplyDelete
  2. दु:ख हैं बड़े
    गली-चौराहे पर
    युगों से खड़े
    दिल को छू गया ये हाईकु। सभी हाईकु बहुत पसंद आये बधाई आपको।

    ReplyDelete
  3. नम हैं आँखें
    बिछुड़ गया कोई
    छूकर छाया
    Waah Waah. Poori ki poori Zindagi ka nichod chand lazfon mein. Bahut mubarak Rameshwarji

    ReplyDelete
  4. भाई साहब, यूँ तो आपके सभी हाइकु बहुत सुन्दर मानव जीवन और प्राकृतिक जीवन की कोमल भावाव्यक्तियों से भरपूर लगे' परन्तु पहले ही हाइकु ने जिस प्रकार मन मोहा, वह तो बयान नहीं कर सकता। बहुत सच बात कह दी आपने- 'दुख हैं बड़े/गली चौराहे पर/युगों से खड़े…' तीसरा हाइकु दिल को जैसे छूता हुआ निकल गया… और एक हाइकु में आपने 'रड़कें' शब्द का बहुत सुन्दर उपयोग किया है… आप ऐसे मानक और श्रेष्ट हाइकू प्रस्तुत करके नि:संदेह इस क्षेत्र में फैला धुंधलका साफ़ कर देंगे, ऐसी मेरा मानना है।

    ReplyDelete
  5. यों सभी हाइकू अच्छे हैं लेकिन पहला बहुत अच्छा है ।

    ReplyDelete
  6. सुंदर लगी / हमेशा की तरह / हाइकु सारी ...इसी तरह / लिखते रहे आप/ शुभकामना...

    ReplyDelete
  7. बेहतरीन हाइकू……………दिल को छू गये।

    ReplyDelete
  8. यूँ तो सभी अनमोल मोती हैं, लेकिन मुझे यह कुछ जादा ही विशिष्ट लगे.

    याद तुम्हारी / छल-छल छलकी /बनके आँसू
    क्या कहूँ, इतनी सुन्दर अभिव्यक्ति की प्रशंसा करने लायक शब्द नहीं हैं मेरे पास. याद तुम्हारी छल-छल छलकी.. की लयात्मकता तो बस अद्भुत है.

    भटका मेघ /धरती को तरसे /तभी बरसे
    मेघ की धरती के लिए तड़प ही तो बूंदे बनकर बरसती है... एकदम अनूठा प्रयोग

    पुरानी यादें- /सुधियों की पावस /भीगा है मन
    सुधियों की पावस तो बस ऐसी ही होती है जिसमे मन पोर पोर भीगता है, डूबता है

    दु:ख हैं बड़े
    गली-चौराहे पर
    युगों से खड़े
    इस स्थायित्व की पीड़ा को जीना और महसूस कर पाना एक अलग सा ही अहसास है.

    ReplyDelete
  9. आद. हिमांशु जी,
    "दु:ख हैं बड़े
    गली-चौराहे पर
    युगों से खड़े!"

    सभी हाइकू जीवन की संवेदना को बड़े ही प्रभावी ढंग से मुखरित कर रहे हैं !
    शिल्प का कसाव भावों की सम्प्रेषणता को प्राणवान कर रहा है !
    आभार!

    ReplyDelete
  10. आपकी उम्दा प्रस्तुति कल शनिवार (19.02.2011) को "चर्चा मंच" पर प्रस्तुत की गयी है।आप आये और आकर अपने विचारों से हमे अवगत कराये......"ॐ साई राम" at http://charchamanch.uchcharan.com/
    चर्चाकार:Er. सत्यम शिवम (शनिवासरीय चर्चा)

    ReplyDelete
  11. bahut sunder , iska to kahna hi kya -
    दु:ख हैं बड़े
    गली-चौराहे पर
    युगों से खड़े
    sahityasurbhi.blogspot.com

    ReplyDelete
  12. असीम वेदना से भरे मर्मस्पर्शी कोमल एहसास .

    ReplyDelete
  13. सुंदर प्रस्तुति,गहरे अर्थ

    ReplyDelete
  14. अतिसुन्दर...भावपूर्ण...कौन से शब्द ढूँढू अपनी बात कहने के लिए...। शब्दों के जादूगर तो आप हैं...।
    आज तक धरती मेघ को तरसती थी, पर मेघ की तरसन से आपने अनोखा-अभिनव आनन्द दे दिया...।
    मेरी बधाई...।

    प्रियंका

    ReplyDelete
  15. Respected Sir,
    Abhi aapke haiku parhe. Sabhi haiku itne achchey hain, ki unki tareef mein kuch likhne ke liye hamare paas shabd hi nahi hain. Aap ko bahut bahut badhai.

    Mumtaz and T.H.Khan

    ReplyDelete
  16. शब्दों के चित्रकार ने फिर से जादू किया....कितनी खूबसूरती से शब्दों की माला बनाई है
    बहुत ही गहरे भाव...
    सभी हाइकु एक से बढ़कर एक हैं!
    झील उफ़नी/जब बिसरी यादें/घिरीं बरसीं

    मन को कितनी खूबसूरती से दिखाया गया है !

    ReplyDelete
  17. नम हैं आँखें
    बिछुड़ गया कोई
    छूकर छाया

    याद तुम्हारी
    छल-छल छलकी
    बनके आँसू

    झील उफ़नी
    जब बिसरी यादें
    घिरीं बरसीं

    udasi par isse ache haiku koi likh sakta hai to dil se aavaj aati hai....nahi kabhi nahi...

    ReplyDelete
  18. sabhi haaiku behtareen hain, bhaav ki bahut gahri abhivyakti, badhaai bhaaisahab.

    ReplyDelete