Monday, August 30, 2010

बीवी बोली-

बीवी बोली- मैं मर गई तो दूसरी शादी कर लोगे ?



मैँ बोला-जो तुम मर गई तो मैँ पागल हो जाऊँगा


और पागल का क्या है भरोसा,वो कुछ भी कर सकता है .


-अमीर मुमकिन सहारनपुरी


(यह त्रिपदी हिन्दी -उर्दू के मशहूर कवि आदिल रशीद जी ने उपलब्ध कराई है)

Thursday, August 26, 2010

शीतल छाँव



भाई बहन का प्यार संसार की अमूल्य निधि है ।इस निधि का प्रतिदान सम्भव नहीं ।उस अनुभूत प्रेम के लिए शब्द  ढूँढ़े नहीं मिलते । डॉ भावना कुँअर ने अपने भाव इस प्रकार व्यक्त किए
   सुलझा देता 
   उलझनों के तार
    भाई का प्यार।
    -डा भावना  
 इन शब्दों को आगे बढ़ाने का जो  एक छोटा-सा प्रयास किया गया, वह इस प्रकार है-                          
गंगा की धार
है बहनों का प्यार

बही बयार।


पावन  मन

जैसे नील गगन

नहीं है छोर ।


शीतल छाँव

ये जहाँ धरे पाँव
मेरी बहन ।                                                                                                                                 

Tuesday, August 24, 2010

रक्षा -बंधन पर विशेष



कुछ पास कुछ दूर बहनें

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

दुनिया का ऊँचा प्यार बहनें
गरिमा- रूप  साकार बहनें
रेशमी धागों से  बँधा है
हैं सभी अटूट  तार बहनें ।
कुछ हैं पास ,कुछ दूर बहनें
सभी आँखों का नूर बहनें
हमको सभी की याद आती
जब याद आती ,है सताती ।
गहरे समन्दर ,पार हैं कुछ
वे बहुत कम ही इधर आती
आराम से हैं - वे बताती
 अपने सभी वे दुख छुपातीं ।
पर फोन पर आवाज़ सुनकर
मैं तो सभी कुछ जान जाता
गीले नयन मैं पोंछ उनके
मन ही मन  में यही मनाता-
सब दुख मुझे मिल जाएँ उनके
चेहरे खिल जाएँ उनके
न आँच  उनके पास आए
कोई पीर न उनको सताए ।
और  बहनें जो इस पार हैं
 वे दोनों घरों का प्यार हैं
बहुत काम सिर पर है  उनके
वे भी बहुत लाचार हैं ।
परदेस में बैठा है भाई
निहारता सूनी कलाई
घिरता नयनों में बचपन
फिर घुमड़ उठती है रुलाई ।
-0-

रक्षाबन्धन- [हाइकु]


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
1-बहने हैं छाँव
         शीतलता  मन की
          ये जीवन की ।

2-बहनें आईं
खुशबू लहराई
राखी सजाई ।

3-राखी के धागे
मधुर रस -पागे
बहिनें बाँधें ।

4-गले से लगी
सालों बाद बहिन
नदी उमगी ।

5- बहिनें सभी
मेरी आँखों का नूर
पास या दूर ।

6-उठी थी पीर
बहिनों के मन में
मैं था अधीर ।

7-इस जग में
ये बहिनों का प्यार
है उपहार ।

8-राखी का बन्ध
 बहिनों से सम्बन्ध
  न  छूटे कभी ।

9-सरस मन
खुश घर -आँगन
आई बहिन ।

10-अश्रु-धार में
जो शिकायतें -गिले
धूल -से धुले ।

11-आज के दिन
बहिन है अधीर
 आया न बीर ।

12-खिले हैं मन
आज नेह का ऐसा
दौंगड़ा  पड़ा ।

13- छुआ जो शीश
भाई ने बहिन का
झरे आशीष ।

14-मन कुन्दन
कुसुमित  कानन
हर बहन ।
-0-

 [दौंगड़ा-बहुत तेज बारिश]

Wednesday, August 18, 2010

कविताएँ

रेखा मैत्र रेखा मैत्र का जन्म बनारस (उ.प्र.) में हुआ। प्राथमिक शिक्षा बनारस में होने के बाद आपने सागर विश्वविद्यालय से हिन्दी साहित्य में एम.ए. किया। तदनन्तर, मुम्बई विश्वविद्यालय से टीचर्स ट्रेनिंग में डिप्लोमा प्राप्त किया। इसके अलावा आपने केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा में प्रशिक्षकों के प्रशिक्षण के विशेष कार्यक्रम में भाग लिया। कुछ समय तक मध्य प्रदेश में आयोजित अमरीकी पीस कोरके प्रशिक्षण कार्यक्रम में अमरीकी स्वयंसेवकों को आपने हिन्दी भाषा का प्रशिक्षण दिया। फिर ५-६ वर्षों तक राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत सरकार के मुम्बई स्थित हिन्दी शिक्षण योजना के अन्तर्गत विभिन्न केन्दीय कार्यालयों/उपक्रमों/कम्पनियों के अधिकारियों और कर्मचारियों को हिन्दी भाषा का प्रशिक्षण दिया।
अमरीका में बसने के बाद आपने अमरीका स्थित गवर्नेस स्टेट यूनिवर्सिटीसे कुछ ट्रेनिंग कोर्स किए और कुछ समय तक वहाँ अध्ययन कार्य किया। फिर कुछ समय के लिए आप मलेशिया में रहीं और अमरीका में अंकुरित काव्य-लेखन यहाँ पल्लवित हुआ। आजकल आप फिर अमरीका में हैं और यहाँ भाषा के प्रचार-प्रसार से जुड़ी साहित्यिक संस्था उन्मेषके साथ आप सक्रिय रूप से जुड़ी हैं और काव्य लेखन में मशगूल हैं।


प्रकाशित कृतियाँ :
१ पलों की परछाइयाँ
२ मन की गली
३ उस पार
४ रिश्तों की पगडण्डियाँ
५ मुट्ठी भर धूप
६ बेशर्म के फूल
७ मोहब्बत के सिक्के
८ ढाई आखर
९ बेनाम रिश्ते
वेब - rekhamaitra.com
सम्पर्क :rekha.maitra@gmail.com
1-मुट्ठी भर धूप
मुट्ठी भर धूप की तलाश में
इस ठण्डे शहर में
मारी -मारी फिरी !
कहीं उसका निशाँ तक नहीं !
सब तरफ बर्फ और बर्फ !
सर्दी से ठिठुरती रही
तन से भी ,मन से भी !
तभी तुम थके -हारे
मेरे पास चले आये !
तुम्हारे कंधे पर मैंने
अपना हाथ रख दिया
तुमने बताया कि मेरे
हाथों में धूप सी उष्णता है
और ...........!
एक नन्हा सा सूरज
मेरे भीतर उग आया
तब से धूप की बाहर तलाश बंद !
-0-
2 -भेंट
प्यार के उपहार में
आँसू जो मिले मुझे
देखो उन्हें आँखों में
अंजन सा आँज लिया !
इनमे तो जीवन के
सारे रंग घुले हैं
जब तुम्हारे प्यार की
किरणे पड़ी इन पर
सारे इन्द्रधनुषी रंग
साथ झिलमिलाते हैं !
यूँ तो सहेजा है
बड़े जतन से इन्हें
फिर भी एक सोच सी
घिरती है आस -पास
कहीं न ढलक जाएँ
मेरे अनजाने में !
खाली एक बात मेरा
कहने का मन है
भेंट तुम्हें आँसू की
देनी थी मुझे जो
इनको सहेजने का
जतन तो सिखाना था ....!!!
3- खोज
वृक्ष की सशक्त शाखों से
बाहें दो याद आईं
फिर खयाल आया
प्यार पाना नहीं
देना है !
इतना सब जानते भी
कुछ -कुछ रह जाता है !
मैंने कहाँ जाना था
कि देने और पाने में
ये भी ज़रूरी है जानना
कि जो मैंने दिया है
क्या तुमने पाया है ?
उसी पूर्णता की तृप्ति
तुम्हारी आँखों में खोजती हूँ !
-0-

Sunday, August 15, 2010

आटे की चिड़िया (हाइकु)

- डॉ हरदीप संधु रामेश्वर काम्बोजहिमांशु
मुन्नी जो रोए
आटे की चिड़िया से
माँ पुचकारे !
चिड़िया मिली
मुनिया की बिखरी
दूधिया हँसी ।
उड़ती नहीं
आटे की चिरइया
ओ मेरी मैया !
अभी ये छोटी
उड़ेगी तब जब
खाएगी रोटी ।
रोटी ही लाओ
माँ इसको खिलाओ
उड़ेगी फुर्र !
रोटी खाकर जब
ये फुर्र से उड़ जाएगी
हाथ नहीं आएगी ।

Saturday, August 14, 2010

आज़ादी है

आज़ादी है : रामेश्वर काम्बोज हिमांशु'

नाचो गाओ ,खुशी मनाओ- आज़ादी है

लूटो खाओ , पियो-पिलाओ आज़ादी है

भूखी जनता टूक न मिलता आज़ादी है

छीनो -झपटो ,डाँटो डपटो आज़ादी है

दफ़्तर-दफ़्तर ,बैठे अजगर आज़ादी है

जेब गरम है ,बिकी शरम है आज़ादी है

फ़ाइल सिसके ,बाबू खिसके आज़ादी है

सज्जन रोता , आफ़त ढोता -आज़ादी है

नोट बिछाए ,नींद न आए -आज़ादी है

गुण्डे छूटे , जीभर लूटे -आज़ादी है

छीना चन्दा ,अच्छा धन्धा -आज़ादी है

नफ़रत पलती , बस्ती जलती -आज़ादी है

पेड़ कटे हैं, खेत लुटे हैं -आज़ादी है

कपटी मुखिया ,हर घर दुखिया -आज़ादी है

जब मुँह खोलें , लटपट बोलें -आज़ादी है

सुरसा आई , बन महँगाई आज़ादी है

आज पुजारी , बने जुआरी -आज़ादी है

ढोंगी बाबा , अच्छा ढाबा -आज़ादी है

लूट मची है , छूट मची है -आज़ादी है

सब कुछ लूटा , धीरज छूटा -आज़ादी है

घोटाले हैं, दिलवाले हैं- आज़ादी है

आग-धुआँ है ,नहीं कुआँ है -आज़ादी है

गड्ढा सड़कें , चल गिर पड़के-आज़ादी है

गुरु है ढेला ,गुड़ है चेला -आज़ादी है

जाति धर्म है , बुरे कर्म हैं-आज़ादी है

भाई-भाई , लड़ें लड़ाई - आज़ादी है

अपनी अपनी ,सबकी ढपली -आज़ादी है

कामचोर हैं ,घूसखोर हैं-आज़ादी है

चोरी करते ,ज़रा न डरते -आज़ादी है

सन्न इलाका , दिन में डाका-आज़ादी है

बन्द है चक्का, धक्कम धक्का -आज़ादी है

करते अनशन ,रोज़ प्रदर्शन -आज़ादी है

चोर लुटेरे , सबको घेरे -आज़ादी है

जागो-जागो , अब तो भागो आज़ादी है

जिसका जूता , उसका बूता -आज़ादी है

भूखे घर हैं , प्यासे दर हैं-आज़ादी है

ऊँचा झण्डा , चलता डण्डा-आज़ादी है

रहे जो भक्षक ,बने वे रक्षक-आज़ादी है

लुटा ख़ज़ाना , सबने माना -आज़ादी है

भले जेल में , बुरे खेल में-आज़ादी है

न्याय रो रहा , चोर सो रहा -आज़ादी है

क्या अब करना , जीना ? मरना-आज़ादी है

आओ प्यारे वीरो आओ -आज़ादी है

हाथ लगे जो ,सब खा जाओ -आज़ादी है

-0-