Sunday, May 9, 2010

मेरी माँ

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

चिड़ियों के जगने से पहले

जग जाती थी मेरी माँ ।

ढिबरी के नीम उजाले में

पढ़ने मुझे बिठाती माँ ।

उसकी चक्की चलती रहती

कोई गीत न गाती माँ ।

गाय दूहना, दही बिलोना

सब कुछ करती जाती माँ ।

सही वक़्त पर बना नाश्ता

जीभर मुझे खिलाती माँ ।

घड़ी नहीं थी कहीं गाँव में

समय का पाठ पढ़ाती माँ ।

छप्पर के घर में रहकर भी

तनकर चलती फिरती माँ ।

लाग लपेट से नहीं वास्ता

खरी-खरी कह जाती माँ ।

बड़े अमीर बाप की बेटी

अभाव से टकराती माँ ।

धन बात का उधार न सीखा

जो कहना कह जाती माँ

अस्सी बरस की इस उम्र ने

कमर झुका दी है माना ।

खाली बैठना रास नहीं

पल भर कब टिक पाती माँ ।

गाँव छोड़ना नहीं सुहाता

शहर में न रह पाती माँ ।

यहाँ न गाएँ ,सानी-पानी

मन कैसे बहलाती माँ ।

कुछ तो बेटे बहुत दूर हैं

कभी-कभी मिल पाती माँ ।

नाती-पोतों में बँटकर के

और बड़ी हो जाती माँ ।

मैं आज भी इतना छोटा

कठिन छूना है परछाई ।

जब जब माँ माथा छूती है

जगती मुझमें तरुणाई ।

माँ से बड़ा कोई न तीरथ

ऐसा मैंने जाना है ।

माँ के चरणों में न्योछावर

करके ही कुछ पाना है ।

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