Wednesday, October 13, 2010

तुम ग्लेशियर हो !

तुम ग्लेशियर हो !
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु



हे प्रियवर !
परम आत्मीय
जानता हूँ  मैं-
आहत होता है मन ,
जब कोई अपना
दे जाता है फाँस की चुभन ।
फाँस का रह रहकर टीस देना






कर देता है सजल नयन  !
जो लोग तुम्हें जान नहीं पाते,
इसलिए वे पहचान नहीं पाते
कि घाटियों में ठोकरें खाकर
नीचे गिरते झरने 
बल खाती साँप सी  विरल जल की सरिताएँ
कितनों को सुख पहुँचाते हैं  !
लेकिन सुखों का स्वाद लेने वाले
इसे कब समझ पाते हैं -
ग्लेशियर का पिंघलना
घाटियों से बूँद-बूँद जल का रिसकर
धारा में बदलना
नदी बनकर सागर तक का सफ़र पूरा करना ।
तुम तो ग्लेशियर हो !
जो ग्लेशियर को नहीं जानते
वे नदी का रूप भी नहीं पहचानते ।
इस तरह जो ग्लेशियर को खोते हैं
वे नदी के भी सगे नहीं होते हैं ।
उनसे अपनेपन की आशा करना
है आकाश में फूलों का खिलना ,
दो किनारों का आपस में मिलना ।
ग्लेशियर !
जब तुम किसी ताप से
पिंघलकर बहो
किसी से अपने मन की पीर ज़रूर कहो
जब किसी से ( वह भी कोई आत्मीय ही होगा)
अपनी पीर कहोगे
कुछ तो मिटेगा ताप
फिर इतना नहीं बहोगे
तभी बच पाओगे
अपनी शीतलता से
आने वाली सदी तक बने रहोगे ।
-0-

17 comments:

  1. aap ne kya pyari tula ki hai .padh ke aanad aaya
    अपनी पीर कहोगे
    कुछ तो मिटेगा ताप
    फिर इतना नहीं बहोगे
    तभी बच पाओगे
    अपनी शीतलता से –
    आने वाली सदी तक बने रहोगे ।
    kavita ka itna sunder ant kam hi dekhne ko milta hai
    aap ko koti koti badhai
    saader
    rachana

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  2. लाजवाब किस तरह से मन के भाव उड़ेले हैं .कविता और चित्रों का सामंजस्य बढ़िया लगा

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  3. "जब किसी से
    अपनी पीर कहोगे
    कुछ तो मिटेगा ताप
    फिर इतना नहीं बहोगे"

    जब किसी से
    अपनी पीर कहोगे
    कुछ तो मिटेगा ताप
    फिर इतना नहीं बहोगे

    बहुत ही सुन्दर कविता... एकदम सच कहा आपने ... "पीर कहोगे ... तो इतना नहीं बहोगे."... वो कहते हैं न ! ....पीर बांटने से आधी होती है और सुख दुगना ....सुख हो या दुःख बांटें जरूर

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता।
    नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नम:।।
    नवरात्र के पावन अवसर पर आपको और आपके परिवार के सभी सदस्यों को हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई!

    साहित्यकार-6
    सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

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  5. आहत होता है मन
    जब कोई अपना दे जाता है
    फाँस की चुभन ।
    ............
    हाँ और वो फाँस
    इतनी गहरी चुभती है
    कि कुरेद डालती है
    बीता वक्त और बीती यादें
    जिन यादों में भी
    गहरे जख्म कि सिवा कुछ भी न था
    उसी जख्म को और कुरेदती है
    ये फाँसे
    और अब वो जख्म नासूर बन चुका है
    इतना बड़ा नासूर कि
    अब कोई नदी, कोई समुद्र के रास्ते चलना भी
    भूल जाता है ग्लेशियर बस अब तो
    वो पिघलकर भरना भी नहीं चाहता
    सच तो ये है कि वो अब पिघलना भी नहीं चाहता
    पर क्या करे पिघलना तो उसकी नियति है ना
    भला नियति के आगे किसी के चली है कभी
    तो क्या करे बेचारा ग्लेशियर
    अच्छा कि अब वो मुक्त हो जाये हमेशा के लिए
    और अपनी पिघलने की नियति को बदल डाले
    और बन जाये एक ऐसा पत्थर जिस पर कोई असर ही नहीं होता...

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  6. बहुत गज़ब...वाह!

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  7. भावना बहिन एक गीतकार ( शायद समीर) ने कहा है - जगाभी जीता नहीं है , मैं अभी हारा नहीं हूँ । फ़ैसला होने से पहले हार क्यों स्वीकार कर लूँ॥
    -हम लोग बनावटी हितैषी नहीं हैं , आपकी निराशा को दूर करेंगे । आपके रास्तों पर उजाले का नूर भरेंगे ।

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  8. रामेश्वर जी और भावना जी,
    आपकी बात को आगे बढ़ाते हुए मैं कुछ यूँ कहना चाहती हूँ.....
    आहत होता है मन
    जब कोई अपना दे जाता है
    फाँस की चुभन.........
    ..............
    फाँस की चुभन
    कर जाती है सजल नयन
    बह जाता है दु:ख सारा
    जो कभी था ही न तुम्हारा
    आँखों में आई नमी
    धो डालती है
    आँखो की धूल
    फिर तुम नहीं करते
    किसी को
    पहचानने में भूल
    साफ़ हुई आँखो से
    तुम ज़्यादा देख पाते हो
    सब को पहचान जाते हो.....

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  9. हाँ सच है ये कि हो जाती है पहचान
    पर जब तक पहचान होती है
    तब तक हम मिट चुके होते हैं
    डूब चुके होते हैं उसकी बनाई
    सपनों की दुनिया में
    अपाहिज हो जाता है हमारा वज़ूद
    बिना उसके
    और आदत बन जाती है
    उसके साथ जीने की
    और उस वक्त उसका इस कदर बेगाना पन?
    इतना अविश्वास
    इतनी कट्टरता
    जीने लायक छोड़ता ही कहाँ
    खत्म हो जाती है वो सपनों जैसी दुनिया
    और बचते हैं कुछ अवशेष
    जिनको चुनना भी किसी को गवारा नहीं होता
    कौन बिखरी टूटी साँसों को गले लगाता है
    यहाँ जिंदा चलती फिरती लाशों को भी
    लोग अपना कहने से कतराते हैं...

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  10. बहिन भावना जी और हरदीप जी !आपने तो बहुत अच्छा लिखा है । सबका अपना-अपना अनुभव होता है , आप दोनों ने काम्बोज जी को भी पीछे छोड़ दिया है ।

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  11. Kamoj ji bahut hee sunder kavita hai apki, pad kar laga ki yeh hum sabh ki hi kahani hai.

    कर देता है सजल नयन !
    जो लोग तुम्हें जान नहीं पाते,
    इसलिए वे पहचान नहीं पाते
    कि घाटियों में ठोकरें खाकर
    नीचे गिरते झरने
    बल खाती साँप –सी विरल जल की सरिताएँ
    कितनों को सुख पहुँचाते हैं !
    लेकिन सुखों का स्वाद लेने वाले
    इसे कब समझ पाते हैं -
    ग्लेशियर का पिंघलना
    घाटियों से बूँद-बूँद जल का रिसकर
    धारा में बदलना
    नदी बनकर सागर तक का सफ़र पूरा करना ।
    तुम तो ग्लेशियर हो !

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  12. सुन्दर भाव और अभिव्यक्ति के साथ शानदार प्रस्तुती! बधाई!

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  13. Respected Sir,"TUM GLACIER HO", bahut sunder kavita hai. Glacier ke tapne aur pighalney ko bahut sundar shabdon mein likha hai.Aap ki kavita parhney ke baad hamara man kuch is tarah kehta hai ki,

    jab milta hai kisi se apnapan
    door ho jati har phans ki chubhan
    peerh nahin kar pati sajal nayan
    glacier ka barhta hai sheetalpan.


    From :- Mumtaz & T.H.Khan

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  14. बहन मुमताज़ ्जी और सम्मानीय भाई खान साहब !
    आप दोनों की बात पूरी तरह सही है । मैं तो यही कह सकता हूँ-
    जहाँ होता है अपनापन
    वहाँ होती ही नहीं चुभन ।
    शूल वहाँ बन जाते फूल
    आग बनती शीतल चन्दन ।
    रामेश्वर काम्बोज

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  15. वाह ! वाह ! मज़ा आ गया...। पढ़ रही थी काम्बोज जी की कविता और उसमें भावना जी और हरदीप जी की कविताओं का भी आनन्द उठाने का मौका मिला...। आप तीनों को बहुत बधाई...और आगे भी ऐसी ही खूबसूरत जुगलबन्दी की शुभकामनाएँ...।

    प्रियंका

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  16. मैं सभी का आभारी हूँ । मेरी कविता पर की गई टिण्णियाँ अपने आपमें मेरी कविता से भी बेहतर कविताएँ बन गई हैं । सभी का हार्दिक आभार ।

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  17. प्रतीकों के माध्यम से भावों की अभिव्यक्ति अति सुन्दर है |
    सुधा भार्गव

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