Monday, March 1, 2010

तीन वर्ष पूरे

प्रिय हिमांशु भाई,
होली की शुभकामनाओं के साथ लेखनी का होली -विशेषांक भेज रही हूँ, उम्मीद है पसंद आएगा।

यहाँ इंगलैंड में भले ही अभी पातहीन वृक्षों पर कोपलें न फूटी हों, परन्तु चिड़ियों ने घोसले बनाने शुरु कर दिए हैं। सृजन और संरक्षण की इस एक और नई नवेली ऋतु में...बाहर बर्फ़ हो या बासंती बयार, आइये लेखनी के इन पन्नों पर हम आप खेलते हैं फाग। मनाते हैं एक बार फिरसे वही रूप और रंग का महोत्सव...रंग और रूप जिसके बिना व्यंजन ही नहीं, जीवन भी स्वादहीन है...जिसके हम-आप, हमारी संस्कृति और सभ्यता, सभी चिर दीवाने-से दिखते है।

यह भी एक सुखद संयोग की ही बात है कि लेखनी का यह अंक ठीक होली के दिन ही आपतक पहुँच रहा है, होली की उल्लास भरी शुभकामनाएँ तो हैं ही, यह भी याद दिलाना चाहूँगी कि प्रयास और खोज के नए-नए पड़ाव पार करती आपकी लेखनी इस अंक के साथ अपनी सृजन-यात्रा के तीन वर्ष पूरे कर, चौथे वर्ष में प्रवेश कर रही है। आइये इसकी खुशियों में शामिल होते हैं। यह पर्व भी तो किसी उल्लास, किसी महोत्सव से कम नहीं..इसे अपना प्यार, अपनी शुभकामनाएं नहीं देंगे क्या …!
pls, visit www.lekhni.net
पुनः रंगपर्व होली की इन्द्रधनुषी शुभकामनाएँ!!

1 comment:

  1. सृजन यात्रा के तीन वर्ष पूर्ण होने पर बधाई एवं शुभकामनाएँ.


    ये रंग भरा त्यौहार, चलो हम होली खेलें
    प्रीत की बहे बयार, चलो हम होली खेलें.
    पाले जितने द्वेष, चलो उनको बिसरा दें,
    खुशी की हो बौछार,चलो हम होली खेलें.


    आप एवं आपके परिवार को होली मुबारक.

    -समीर लाल ’समीर’

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