Friday, November 27, 2009

मुक्तक

मुक्तक
बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के ।
शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव के ।
दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े
यहाँ पहुँच झुलसे सभी साथी ठण्डी छाँव के ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Tuesday, November 17, 2009

शुभकामना !

 पल पल सुनहरे फूल खिले ,
कभी न हो कांटों का सामना !
 जिंदगी आपकी खुशियों से भरी रहे ,
दीपावली पर हमारी यही शुभकामना !!
संगीता पुरी

Saturday, November 7, 2009

मैं उजाला हूँ


-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
मैं उजाला हूँ ,उजाला ही रहूँगा ।
अँधेरी गलियों में ज्योति-सा बहूँगा ।
चाँद मुझे गह लेंगे कुछ पल के लिए ,पर मैं रोशनी की कहानी कहूँगा ॥



पल जो भी मिले हैं मुझे उपहार में ।
उनको लुटा दूँगा मैं सिर्फ़ प्यार में ।
नफ़रत की फ़सलें उगाई हैं जिसने;
मिलेगा उसे क्या अब इस संसार में ॥