Wednesday, October 28, 2009

विजया दशमी मंगलमय हो !


विजया दशमी मंगलमय हो !
विजया दशमी मंगलमय हो !
जीवन सबका सदा अभय हो !
दूर     अभावों   की  बस्ती से,
हो प्यार ,तन-मन निरामय हो !
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

Sunday, October 25, 2009

दो कविताएँ

1 मजदूर

मधुर कुलश्रेष्ठ

शहर के व्यस्ततम चौराहे पर
लगी है हाट मजदूरों की
लोग आलू, प्याज की तरह
हाथों की मछलियाँ देख-देखकर
छाँट रहे हैं मजबूत मजदूर
ताकि मजदूर के पसीने की बूँदों से
चमक उठे
उनके सपनो का महल.



2-अपना अपना दर्द

झोपड़ी को दर्द है

कि वह कभी

अपना सिर उठाकर

सीना ताने

आसमान से बातें नहीं कर पाई

और महलों को दर्द है

कि वह हमेशा

अपना सारा अस्तित्व

समेट कर भी

धरती की गोद में

सिमटकर सोने में

नाकामयाब रहा है।


Sunday, October 18, 2009

शत-शत दीप जलाएँ



-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
अँधियारे के सीने पर हम
शत-शत दीप जलाएँ ;
दिल में दर्द बहुत है माना,
फिर भी कुछ तो गाएँ ।
दुख की नदी बहुत है लम्बी
बहुत ही छोटी नैया ,
छप-छप करती तिरती जाती
पार पहुँचती भैया !
दूर किनारा ,गहरी धारा
देख नहीं घबराएँ ।
आँसू और मुस्कान सभी का
इस जीवन में हिस्सा ;
फूल खिले जब तक साँसों के
तब तक का यह किस्सा ।
भरी सभा है नील गगन तक
गाकर इसे सुनाएँ ।
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