Friday, May 15, 2009

पत्रिका:अप्रतिम वार्षिकी


अप्रतिम वार्षिकी
[जनवरी 2009]
सम्पादक : वीरेन्द्र कुमार सिंह
आवरण एवम सज्जा : नीता सिंह
सम्पर्क:पो बा न 3,
पो ओ गोमती नगर ,लखनऊ-226010
पृष्ठ ; 150 ,मूल्य ; तीस रुपये
साहित्य का अखाड़ा खूँदने वाले लोगों से हटकर साफ़-सुथरी पत्रिका निकालना एक चुनौती भरा कार्य है । श्री वीरेन्द्र कुमार सिंह जी ने इस चुनौती भरे कार्य को बखूबी अंज़ाम दिया है । ‘कुछ अपनी’सम्पादकीय में सम्पादक ने प्रचार की प्राणवायु के सहारे ज़िन्दा रहने वाले साहित्यकारों की ख़बर ली है । इस अंक में अप्रतिम द्वारा आयोजित-शैलेश मटियानी स्मृति अखिल भारतीय कहानी प्रतियोगिता’ में प्रथम ,द्वितीय ,तृतीय एवं सांत्वना पुरस्कार प्राप्त कहानीकारों ( सलिल सुधाकर ,अल्पना मिश्र ,तरुण भटनागर ,शमीउद्दीन और मीनाक्षी) के अतिरिक्त तीन अन्य कहानीकारों की कहानियाँ, 5 आलेख , 7 कविताएँ ,3 संस्मरण ,उपन्यास अंश ,7 गीतकारों के गीत-नवगीत,गज़ल ,व्यंग्य,परिचर्चा, नाट्य रूपान्तर साक्षात्कार ,पत्र,लघुकथा , पुनर्प्रकाशन पुस्तक अंश का समावेश किया है ।पत्रिका की पूरी सामग्री पठनीय एवं संग्रहणीय है ।

Monday, May 11, 2009

मणिमाला-3


मणिमाला-3
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-पूजा
       पूजा आडम्बर नहीं मन को  शुद्ध करने की प्रक्रिया है  जो अपने आपको शुद्ध प्रमाणित करने  की आवश्यकता समझते हैं , वे तरह तरह के आडम्बरों में पड़ते हैं ।
2- लोभ-वृत्ति
       लोभ-वृत्ति मनुष्य के आत्मसम्मान को डँस लेती है।
3-विवेक
       उचित अनुचित का विवेक करना , मनुष्य के मनुष्य होने की पहचान है । सेठ साहूकार के पास गिरवी रखा धन प्राप्त हो सकता है; परन्तु गिरवी रखा विवेक नहीं ।
4-प्रकाश के उपासक
       अँधेरे में रहना , अँधेरे में रखना रोशनी के शत्रुओं की प्रवृत्ति रही है। प्रकाश के उपासक युगों-युगों से अँधेरे की हर पर्त उघाड़ने के लिए प्रयासरत रहे हैं ।
5-साधनों की पवित्रता
       कोई भी कार्य अपने साधनों से श्रेष्ठ माना जाता है। निकृष्ट साधनों से प्राप्त स्वर्ग भी त्याज्य है ।
6-कर्मशील
        मैं नरक में भी कई जन्मों तक रह सकता हूँ; यदि वहाँ काम से जी चुरानेवाले लोग न हों ।
7- अच्छी सलाह
       सर्प को अमृत रुचिकर नहीं लगता । दुष्ट को अच्छी सलाह कभी नहीं भाएगी ।
8-धर्म
       जो धर्म मनुष्य को मनुष्य नहीं समझता वह  मनुष्य से ऊपर नहीं है; राष्ट्र से ऊपर तो हो ही नहीं सकता ।
9-धर्म और कवच
              धर्म को कवच की आवश्यकता नहीं होती ।धर्म अपने आप में कवच है ।फ़तवों की बैसाखी पर आदमी ही ठीक से नहीं चल सकता ; धर्म कैसे चलेगा ।
[ 24 जनवरी, 2007]

मणिमाला-1


मणिमाला-1

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-बड़ा काम
        जो किसी काम को छोटा समझकर उसे करना नहीं चाहता,वह  ज़िन्दगी में कभी बड़ा काम नहीं कर सकता ।
2-सदाचारी
       सदाचारी व्यक्ति अपने  कार्यों से बड़े बनते हैं। दुराचारी व्यक्ति दूसरों के काम में बाधाएँ उत्पन्न करके बड़प्पन बटोरना चाहते हैं ;लेकिन एक  न एक दिन उनकी कलई खुल जाती है ।
3-विश्वासघात
       मित्रों से विश्वासघात करनेवाला व्यक्ति खुद से भी विश्वासघात करता है ।
4-कपट-भावना
       धूर्त्त व्यक्ति अपनी मीठी-मीठी बातों का सहारा रोज़-रोज़ नहीं ले सकता ।   उसकी कपट-भावना  कभी न कभी प्रकट हो ही जाती है ।
5-शिक्षक
       जिस शिक्षक के मन में जाति-पाँति  और ऊँच-नीच का कूड़ा-कचरा भरा होता है, वह कभी विद्यार्थियों के हृदय को नहीं जीत सकता है ।
6-चापलूस
       चापलूस  व्यक्ति अपना स्वार्थ सिद्ध हो जाने पर अजनबी जैसा व्यवहार करने लगता है ।
7-चुगलखोर
              चुगलखोर पर कभी विश्वास मत करो ।उसके लिए न कोई अपना है और न पराया ।उसकी जीभ को तो विष-वमन करने में ही आनन्द मिलता है ।
8-ईर्ष्या
      ईर्ष्या का प्रारम्भ दुर्बलता  से होता है । मानसिक रूप से पंगु व्यक्ति ईर्ष्या में रात दिन जलकर अपने विवेक की भी हत्या कर देते हैं ।
[10 -8-1986]

मणिमाला-2


मणिमाला-2
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1-अनुभव की आँच
   ठोस व्यक्तित्व का स्वामी अनुभव की आँच में तपकर और सुदृढ़ हो जाता है ; परन्तु फुसफुस व्यक्तित्व वाले लोग अनुभव की आँच नहीं झेल पाते ;इसीलिए पिंघलकर अस्तित्वहीन  जाते हैं ।
2-अनु्भव का मापदण्ड
   अनु्भव का मापदण्ड  कार्यक्षमता है , समय का अन्तराल नहीं ।सजग व्यक्ति एक साल में जितना सीख लेता है ; उलझे विचारों वाला व्यक्ति बीस साल में भी उतना नहीं सीख पाता है ।
3-पलायनवादी व्यक्ति
   पलायनवादी व्यक्ति न दूसरों की बात समझ सकता है और न दूसरों को अपनी बात समझा सकता है। वह कमज़ोर लोगों के सामने गुर्राता है तो दृढ़ लोगों के सामने घिघियाता है ।
4- आत्मप्रशंसा
    जो अपनी प्रशंसा स्वयं करता है, उसे दस-बीस लोग मूर्ख न भी समझें तो क्या फ़र्क पड़ता है ।
5-स्वार्थ
   स्वार्थ का रेगिस्तान सम्बन्धों की तरलता को सुखाकर ही दम लेता है ।
6-शोभा
   जूते पैरों की शोभा बढ़ा सकते हैं, सिर की नहीं  ।सिर की शोभा वही बढ़ा सकता है ;जो सबका   चहेता होता है ।
7-अनुशासन
   अनुशासन आन्तरिक चेतना है। भय के कारण दिखाया गया अनुशासन केवल ढोंग है। व्यवस्था का अंकुश हटते ही भय से अनुशासित लोग कामचोर बनने में पीछे नहीं रहते ।
8-विचार-शक्ति
   जो स्वयं किसी बात का निर्णय नहीं ले सकते  , उनकी विचार-शक्ति  की अकाल मृत्यु हो  जाती है और उन्हें हमेशा किसी दूसरे के इशारों पर ही नाचना पड़ता है ।
9- कंगाल
   दूसरे के मुँह का कौर छीनकर खानेवाला व्यक्ति भले ही करोड़पति बन जाए ; परन्तु मन से वह कंगाल ही रहता है ।
10-ईमानदारी
   यदि किसी की ईमानदारी को परखना है तो उसे बेईमानी  करने का अवसर दीजिए । अवसर मिलने पर भी जो ईमानदार बना रहे ;वही सच्चा ईमानदार है ।
[ 4 जनवरी, 1987]

Friday, May 8, 2009

गुलमोहर की छॉंव में


गुलमोहर की छॉंव में
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु
गर्म रेत पर चलकर आए
छाले पड़ गए पॉंव में
आओ पलभर पास में बैठो
गुलमोहर की छॉंव में ।
नयनों की मादकता देखो
गुलमोहर में छाई है
हरी पत्तियों की पलकों में
कलियॉं भी मुस्काईं हैं।
बाहें फैला बुला रहे हैं
हम सबको हर ठॉंव में।
चार बरस पहले जब इनको
रोप रोप हरसाए थे
कभी दीमक से कभी शीत से
कुछ पौधे मुरझाए थे।
हर मौसम की मार झेल ये
बने बाराती गॉंव में।
सिर पर बॉंधे फूल मुरैठा
सजधजकर ये आए हैं
मौसम के गर्म थपेड़ों में
जीभर कर मुस्काए हैं।
आओ हम इन सबसे पूछें
कैसे हॅंसे अभाव में।
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असभ्यनगर

समीक्षा

असभ्य नगर

असभ्य नगर श्री रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' की बासठ लघुकथाओं का संकलन है। लघुकथा को लेकर हिमांशु जी के पास भावनात्मक आवेग के साथ मूल्यपरक जीवनदृष्टि भी है। इन लघुकथाओं को पढते हुए हम हृदय की उन धडकनों के साक्षी बन जाते हैं जिन्हें हिमांशु जी ने अपनी लघुकथाओं की रक्तवाहिनी माना है।

वस्तुत: लघुकथा आयाम की दृष्टि से ही लघु होती है, प्रभाव की दृष्टि से लघुकथाएँ स्थायी चिह्न छोड जातीं हैं। लघुकथा का प्रारंभ और अंत दोनो ही रचना की मारक क्षमता को पैना बनाते हैं। लघुकथा यदि मन को विचलित कर दे, चेतना को झंकृत कर दे या विचार को उद्वेलित कर दे तो उसका सृजन सार्थक हो जाता है। लघुकथा में भावना का स्फोट तो होता ही है, शब्दों की मितव्ययिता लघुकथा की प्रहार क्षमता को लक्ष्य केंद्रित करती है। यहीं लघुकथा शब्दभेदी (अंतर्भेदी) बाण बन जाती है। लघुकथा में शब्द मंत्रों की शक्ति पा जाते हैं, क्योंकि वे चेतना निर्झर से स्वत: बहकर आते हैं। सायास कलात्मकता की सृष्टि कभीकभी लघुकथा की आत्मा को इतने बोझिल आवरण पहना देती है कि भावना का संस्पर्श हो ही नहीं पाता। इस संकलन में हिमांशु जी की अधिकतर लघुकथाएँ इस व्यर्थ के बोझ से मुक्त हैं।

इस संकलन की कुछ लघुकथाएँ मर्म को छू जातीं हैं और कुछ लघुकथाएँ अपने संक्षिप्त कलेवर में भी किसी महागाथा का सार सोंप जातीं हैं। गंगास्नान की पारो सामाजिक कल्याण को गंगास्नान से अधिक महत्त्वपूर्ण मानकर परिवर्तित मानसिकता का संदेश देती है, वहीं शाप में बिल्लू की माँ शाप के रूप में स्वार्थ आहत होने पर उपजी कटुता को आदर्शों पर वरीयता देकर एक विद्रूप को उजागर कर जाती है। लघुकथा 'संस्कार' संकलन की एक ऐसी लघुकथा है जिसमें लघुकथा के समस्त गुण समाहित हैं। लघुकथा महात्मा और डाकू स्वर्गनरक की अवधारणा के माध्यम से वर्तमान न्याय व्यवस्था के कुरूप चेहरे पर लगे गंभीर मुखौटे को नोच लेने की एक ईमानदार कोशिश कही जा सकती है। वफादारी में कुत्ते के माध्यम से मनुष्य की कृतघ्नता को नकार के गहन स्वर दिए गए हैं। आरोप में जहाँ राजनीति की आपराधिक प्रवृत्तियों का अनावरण है, वहीं स्त्रीपुरुष में तथाकथित शिक्षित वर्ग के मन का कलुष संदेहग्रस्त बौद्धिकता के पहाड पर जमी ब‍र्फ़ की तरह एक बोझ भरा अवसाद छोड जाता हैं।

लघुकथा लौटते हुए में आधुनिक समाज में नारीपुरुष समानता की तमाम लफ्फाजी के बाद भी पुरुष मानसिकता में बसे श्रेष्ठता के भाव को उजागर कर हिमांशु जी ने पतिपत्नी के संबंधों में संदेह के कारण आने वाले भूचाल और पारस्परिक विश्वास की आधारशिला को गहरी मार्मिकता के साथ उद्घाटित किया है। संकलन की अंतिम लघुकथा असभ्य नगर जो संकलन की शीर्षक कथा भी है, नागरी सभ्यता के बड़बोलेपन को जंगली कबूतर और उल्लू के बीच संवाद के माध्यम से अभिव्यक्त करती है। लघुकथा का अंतिम वाक्य '' मेरे भाई, जंगल हमेशा नगरों से अधिक सभ्य रहे हैं। तभी तो ऋषिमुनि यहाँ आकर तपस्या करते थे।'' असभ्य नगर को एक तार्किक परिणिति तक पहुँचा देता है।

लघुकथा ऊँचाई, चट्टे बट्टे, मुखौटा और मसीहा मानवीय मन की भावुक तरलता तथा सामाजिक एवं राजनैतिक विसंगतियों को उजागर करने वाली अन्य उल्लेखनीय रचनाएँ हैं। असभ्य नगर की लघुकथाएं एक ओर मानवीय संवेदनाओं को स्वर देतीं हैं वहीं दूसरी ओर सामाजिक विद्रूपों को पूरे घिनौनेपन के साथ प्रदर्शित कर लेखक के दायित्व बोध की सजगता भी उद्घाटित करतीं हैं। हिमांशु जी की भावुक संवेदना और बेचैनी आशा जगाती है कि भविष्य में वे कुछ और मर्मस्पर्शी लघुकथा संकलन हिन्दी जगत को अवश्य देंगे।

––––– नवीन चतुर्वेदी

जी 1 सार्थक एनक्लेव

साउथ सिविल लाइंस

जबलपुर (म.प्र.)408001