Saturday, December 19, 2009

1-चक्रव्यूह


‘‘मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।’’ सुबह पत्नी ने कहा।

‘‘देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एकएक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कमसेकम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर शुरू कराऊँ।’’

‘‘मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।’’ पत्नी तुनक उठी।

कोई खांसीजुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। सालभर दवाई खिलाकर देख ली। रत्तीभर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।

मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं–‘‘तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....’’ उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिनभर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीनेभर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? सालभर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीनचार सौ ही भेज देता।

एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थिपंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरतापड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।

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4 comments:

  1. बहुत ही संवेदन्शील रचना...! अच्छी लगी।

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  2. आर्थिक स्थिति का बहुत मार्मिक चित्रण है. मन को छू गई ये लघुकथा । बधाई...

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  3. चक्रव्यूह लघुकथा मन को छू गयी । आर्थिक समस्ययें जब चक्रव्यूह की तरह घेर लेती हैं , तब सच में उससे निकल पाना बहुत मुश्किल होता है ।

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  4. अँखें नम होगयी ये मार्मिक कथा पढ कर। आज एक आम आदमी की यही स्थिती है। जीवन का के चक्रव्यूह मे कितना बेबस है आदमी। आभार इसे पडःावाने के लिये।

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