Friday, November 27, 2009

मुक्तक

मुक्तक
बघनखे पहनए हुए, पुरोहित अपने गाँव के ।
शूल अब गड़ने लगे हैं अधिक अपने पाँव के ।
दूर तक है रेत और गर्म हवा के थपेड़े
यहाँ पहुँच झुलसे सभी साथी ठण्डी छाँव के ।
-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

3 comments:

  1. बढ़िया मुक्तक है रामेश्वर जी!!

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  2. nanhi si panktiyon men bahut gahari bat kahi hai aapne bahut2 badhai...
    meri vapasi ho chuki hai blog par padhiyega nayi post dali hai...

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  3. मुक्तक तथा बाकी लघुकथायें भी पढी, सच में आपके लेखन में गंभीर बात को भी सहजता से कह जाने की क्षमता है , वह सराहनीय है ।

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