Tuesday, June 9, 2009

अमलतास के झूमर:




।रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

धरती तपती लोहे जैसी
गरम थपेड़े लू भी मारे।
अमलतास तुम किसके बल पर
खिल -खिल करते बॉंह पसारे।

पीले फूलों के गजरे तुम
भरी दुपहरी में लटकाए।
चुप हैं राहें सन्नाटा है
फिर भी तुम हो आस लगाए।

1 comment:

  1. पंजाब...की सौंधी खुशबू लिए है आपका ब्लॉग....

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