Tuesday, March 24, 2009

मुस्कान तुम्हारी


[आगे बढ़ो तुम पार अँधेरे के ।
दो क़दम दूर हैं द्वार सवेरे के॥]

मुस्कान तुम्हारीपीछे तो केवल छाया है
यही तुम्हारा सरमाया है ।

तुम अपनों को ढूँढ़ रहे हो
कोई साथ नहीं आया है ।

देखी है मुस्कान तुम्हारी
सब कुछ आँसू से पाया है ।

जिसको तुमने गीत कहा था
चुपके रो-रोकर गाया है ।

तुम भी बाज नहीं आते हो
जी भरके धोखा खाया है ।

आशीषों की वर्षा करके
केवल ज़हर तुम्हें भाया है

अपनों का तो सपना पाला
गैरों ने ही अपनाया है ।

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
19 मार्च 2009

4 comments:

  1. khubsurat bahut pasand aayi rachana

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  2. बहुत अच्‍छी रचना है ...

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  3. तुम अपनों को ढूँढ़ रहे हो
    कोई साथ नहीं आया है ।


    eakdam sacchi bat ...koi sath nahi deta...khubsurat rachna...bahut2 badhai..

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  4. Jisko tumne geet kaha tha....chupke ro-roker gaya hai....
    ati sunder bhav....BAdhai

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