Tuesday, November 4, 2008

आम आदमी

आम आदमी
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

आम आदमी-
जिसे हर किसी ने
आम समझकर चूसा है ।
आम आदमी-
जिसके कन्धों पर चढ़कर
भवन बनते हैं
जिसके कन्धों पर चढ़कर लोग
सत्ता की कुर्सी पर टँगते हैं
आम आदमी-
जिसका अन्तिम कौर
गिद्ध ,कौवे और चील
जब चाहे झपटते हैं;
रिरियाने पर ऊपर से और डपटते हैं।
आम आदमी-
चौराहों पर
बेवज़ह मार खाता है
शामत किसी की आती है पर
अचानक वह मारा जाता है।
आम आदमी-
जुलूस में झण्डा उठाकर
आगे-आगे चलता है
डण्डे खाकर बीच सड़क पर गिरता है
सुखद भविष्य का सपना सँजोए
सदा बेमौत मरता है ।
वह सबका भाई
सबका सगा होता है;
इसलिए हरेक ने
केवल उसी को ठगा होता है ।
‘जागो-जागो’ कहकर
सो जाते हैं कर्णधार
कभी आकर कोई देखे-
केवल आम आदमी ही
जगा होता है ।

2 comments:

  1. फ़िर भी समझता नहीं. अपनी गलती बार-बार दोहराता है, नफरत के सौदागरों के कहने पर फ़िर नारा लगाने चला जाता है.

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