Monday, October 6, 2008

रुबाइयाँ-मुक्तक



रुबाइयाँ-मुक्तक


चित्रांकन :डॉ अवधेश मिश्र

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

7

सारा हिज़ाब लाकर क़दमों पे तेरे धर दूँ ।

तेरी सादगी में रंग अपनी वफ़ा का भर दूँ ॥

मेरी मासूम मुहब्बत का ताज़महल तुम हो ।

मेरे संग चलो जो पलभर मशहूर तुमको कर दूँ ॥

8

मैं गिरकर फिर सँभल गया हूँ ।

या रब ! कितना बदल गया हूँ ॥

इक अर्सा हुए उनके दिल से ।

ख़ार की तरह निकल गया हूँ ॥

9 (मुक्तक)

ख़लवतों में भी किया है याद तुझको ,

दर्द की तरह कभी दिल में बसाया ।

पलकों में छुपे तुम कभी आँसू बनकर,

कभी-कभी मुझे सदियों तक रुलाया ॥

10

छाया ये आलम कैसा बेख़ुदी का ।

छुट गया अचानक हाथ ज़िन्दग़ी का ।

वफ़ा करने पर भी मिले दोस्त बेवफ़ा

ये कौन सा तरीका निकाला बन्दग़ी का ॥

11

मेरी तमन्नाओं का तू आखीर बन जा ।

फूटी ही सही ,मेरी तक़दीर बन जा ॥

नाज़ करूँ तुझ पर मैं दिल में बसाके ।

दर्द को जगा दे तू वो पीर बन जा ॥

12

मग़रूर को सज़दा कभी करता नहीं हूँ ।

डगमगाता हूँ ज़रूर मगर गिरता नहीं हूँ ॥

चलो साथ तुम ये तुम्हारी खुशी है ।

इन्तज़ार किसीका कभी करता नहीं हूँ ॥

13

ज़िन्दग़ी इक टूटा हुआ साज़ है ।

मौत इसके नग़मों का आगाज़ है ॥

हँसना और रोना ,तरतीबे-अनासिर-

की राह में क़दमों की आवाज़ है ॥

14

छूटा जो तेरा हाथ इस दिल पे क्या गुज़री ।

देखा जो रुख़े-रौशन महफ़िल पे क्या गुज़री ॥

राह की धूल हम थे तुम दामन बचाके निकले।

किससे पता ये पूछूँ मेरे क़ातिल पे क्या गुज़री है ॥

15

जला ले चिराग़ रौशनी के लिए ।

लगा ले कोई दाग़ ज़िन्दग़ी के लिए ॥

हमसफ़र ग़र नहीं तो क्या हो गया ?

साया ही बहुत आदमी के लिए ॥

16

जिसने न तुझको देखा वो नज़र नज़र नहीं ।

तेरे सिवा इस दिल पे किसी का असर नही॥

मुझको न आई जिस दिन बेरहम याद तेरी।

वो शाम नहीं थी शाम वो सहर सहर नहीं ॥


3 comments:

  1. बेहतरीन मुक्‍तक। बधाई।

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  2. मैं गिरकर फिर सँभल गया हूँ ।


    या रब ! कितना बदल गया हूँ ॥


    इक अर्सा हुए उनके दिल से ।


    ख़ार की तरह निकल गया हूँ ॥

    ati sunder, jeevan ke agni path par chalne ka moolmantr
    Devi Nangrani

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