Tuesday, September 30, 2008

रूबाइयाँ


शायरी
रूबाइयाँ
रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
1
मिट जाए जो बनकर वो तस्वीर नहीं होती ॥
क़त्ल पर करे तौबा वह शमशीर नहीं होती ॥
ठोकरों पर ठोकरें जो सदा देती चले ।
मुझे नहीं तस्लीम ,वह तक़दीर नहीं होती ॥
2
ज़िन्दगी इक हादिसा मुझे ऐसा वहम नहीं ।
बुतपरस्त हूँ मैं पर अजीज़ दैरो-हरम नहीं ॥
भटका न जो राह में वह क्या ख़ाक़ मर्द होगा।
तारीफ़ के काबिल नहीं ,रुस्वाई का ग़म नहीं
3
चन्द चाँदी के सिक्कों में ईमान बिकता है ।
मुट्ठी भर धूल में इंसान बिकता है ॥
दुनिया इक बाज़ार है मैं सराय क्यों कहूँ।
गली-कूँचों में रात दिन भगवान बिकता है ॥
4
ख़ुदा के लिए बख़्श दो सितमग़र हमको ।
दीद की ज़रूरत नहीं न आओ नज़र हमको ॥
बनके फ़ना होना सिलसिला इस जहाँ का ।
मिटकर ही करने दो ज़िन्दग़ी बसर हमको ॥
5
पछता रहे हैं ज़िन्दगी का ऐतबार करके ।
रो दिए क्यूँ हमें इतना प्यार करके ॥
तुम्हें देखा,तुम्हें चाहा दिल का क़ुसूर था ।
चले गए क्यों यकायक मुझे पुकार करके ॥
6
अपनी वफ़ा से ही मैं नाकाम हो गया ।
इश्क़ की तोहमत लगी बदनाम हो गया ॥
मेरे नग़्मों से मिली जिस चमन को ज़िन्दगी ।
फूँका उसने आशियाँ ये क्या अंजाम हो गया ॥

3 comments:

  1. 5


    पछता रहे हैं ज़िन्दगी का ऐतबार करके ।

    रो दिए क्यूँ हमें इतना प्यार करके ॥

    तुम्हें देखा,तुम्हें चाहा दिल का क़ुसूर था ।

    चले गए क्यों यकायक मुझे पुकार करके ॥

    'very very beautiful composition'

    Regards

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  2. बढिया मुक्तक है बधाई।

    ख़ुदा के लिए बख़्श दो सितमग़र हमको ।

    दीद की ज़रूरत नहीं न आओ नज़र हमको ॥

    बनके फ़ना होना सिलसिला इस जहाँ का ।

    मिटकर ही करने दो ज़िन्दग़ी बसर हमको ॥

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