Friday, August 8, 2008

जब तक बची दीप में बाती

जब तक बची दीप में बाती

-रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

 

जब तक बची दीप में बाती

जब तक बाकी तेल है ।

तब तक जलते ही जाना है

साँसों का यह खेल है॥

 

हमने तो जीवन में सीखा

सदा अँधेरों से लड़ना ।

लड़ते-लड़ते गिरतेपड़ते

पथ में आगे ही बढ़ना ।।

 

अनगिन उपहारों से बढ़कर

बहुत बड़ा उपहार मिला ।

सोना चाँदी नहीं मिला पर

हमको सबका प्यार मिला ॥

 

यही प्यार की दौलत अपने

सुख-दुख में भी साथ रही ।

हमने भी भरपूर लुटाई

जितनी अपने हाथ रही ॥

 

ज़हर पिलाने वाले हमको

ज़हर पिलाकर चले गए ।

उनकी आँखो में खुशियाँ थीं

जिनसे हम थे छले गए ॥

 

हमने फिर भी अमृत बाँटा

हमसे जितना हो पाया ।

यही हमारी पूँजी जग में।

यही  हमारा  सरमाया

>>>>>>>>>>>>>> 

(गोमती एक्सप्रेस 27-7-2008)

 

4 comments:

  1. आभार इस प्रस्तुति के लिए.

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  2. उम्दा प्रस्तुति.
    बहुत खूब.

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  3. बहुत सुन्दर !

    (भाई साहब अपने इस ब्लाग से 'वर्ड वैरीफिकेशन" की बंदिश हटाएं।)

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  4. सोना चाँदी नहीं मिला पर
    हमको सबका प्यार मिला ॥

    यही प्यार की दौलत अपने
    सुख-दुख में भी साथ रही ।
    हमने भी भरपूर लुटाई
    जितनी अपने हाथ रही

    बस इतनी सी बात इंसान समझ ले कि जीवन में सोना चाँदी ही सब कुछ नहीं होता तो जिंदगी सँवर जाये
    मंजु

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