Wednesday, October 17, 2007

हाँफता हुआ बच्चा

हाँफता हुआ बच्चा

-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

सुबह-सुबह !
हाँफता हुआ बच्चा

जा रहा स्कूल
पीठ पर लादे
बस्ता किताबों का
गले में झूलती
पानी –भरी बोतल
थके हुए कदम
हलक़ सूखा हुआ
थका हुआ बच्चा
चढ़ रहा
स्कूल की सीढ़ियाँ
आगे खड़ा है –
मुँह बाए
बाघ-सा क्लास रूम !
क्लास रूम में आएँगे
चश्मे के भीतर से घूरते टीचर!
दोपहर हो गई-
छुट्टी की घण्टी बजी
उतर रहा है बच्चा
स्कूल की सीढ़ियाँ-
खट्ट -खट्ट खट्ट- खट्ट
पीठ पर लादे
भारी बस्ता किताबों का
होमवर्क का बोझ
जा रहा बच्चा घर की तरफ
फर्राटे भरता
फूल हुए पाँव
सामने है घर
आँचल की छाया

कुछ कीजिए

कुछ कीजिए
ईमान हुआ बेघर, कुछ कीजिए ।
भटकता है दर–बदर ,कुछ कीजिए ।
फ़रेब के सैलाब से न बच सके
परेशान है रहबर ,कुछ कीजिए ।
रहनुमा बनकर जो कल गले मिले।
वे लिये आज ख़ज़र,कुछ कीजिए ।
बेहया हो गया मौसम बहार का ।
मुश्किल है बहुत सफ़र,कुछ कीजिए ।
ख़ुदा! तू भी परेशान ही होगा
तेरा ख़ौफ़ बेअसर ,कुछ कीजिए ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

Monday, October 15, 2007

उजियार बहुत है


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

दूर उजालों की बस्ती है
पथ में भी अँधियार बहुत है ।
नफ़रत नागफनी बन फैली
पग-पग हाहाकार बहुत है ।
फिर भी ज़िन्दा है मानवता
क्योंकि जग में प्यार बहुत है ।
अँधियारे से आगे देखो
सूरज है,उजियार बहुत है ।
काँटों के जंगल से आगे
खुशबू भरी बयार बहुत है ।
दीवारें मत खड़ी करो तुम
पहले से दीवार बहुत हैं ।
नहीं गगन छू पाए तो क्या
मन का ही विस्तार बहुत है ।
पूजा करना भूल गए तो
छोटा –सा उपकार बहुत है ।
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रचना काल -25-6-2007


और तपो और तपो

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

और तपो और तपो
और तपो और तपो
इसी तपन में देख
छुपी है शीतलता
सोना तपा रोया क्या
दमक उठा खोया क्या?

और चलो और चलो
और चलो और चलो
चाँद चला ,चलता गया
सूरज भी जलता गया
कट गया यूँ सफ़र
पूरी हो गई डगर ।

यह सड़क दुष्कर्म की
पहुँचती है स्वर्ग को
वह सड़क सुकर्म की
नरक द्वार ले चली
ऐसे स्वर्ग से मुझे
नरक ही भला लगे

बढ़े चलो बढ़े चलो
बढ़े चलो बढ़े चलो
सिर्फ़ सरल पंथ पर
बढ़े चलो बढ़े चलो
कुटिल मार्ग छोड़कर
बढ़े चलो बढ़े चलो
एक दिन आएगा
सच मुसकराएगा
सुकर्म की राह में
फूल ही बिछाएगा
धीरज धरो -
चले चलो चलो चलो

रचना-काल: 7जून 07






समीक्षा

जनसाधारण के दुःख का बयान करती कविताएँ
-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’
मैं अयोध्या श्री हरेराम ‘समीप’ की 42 कविताओं का संग्रह है ।आज की आपाधापी में कविता के अर्थ बदल गए हैं। कबीर ,सूर ,तुलसी ,मीरा की कविता घर-घर तक पहुँचती थी क्योंकि उसमे जीवन की आवाज़ होती थी। समय बदला ,कविता के प्रतिमान बदले ,आदमी बदले आदमी के दुःख-दर्द को स्वरूप देने वाले साधन बदले आदमी गौण हो गया ,साधन प्रमुख हो गए ।आदमी की तकलीफ़ कहीं दूर गहरे मे दफ़्न हो गई । हरे राम ‘समीप’ की कविताएँ उसी दफ़्न तकलीफ़ का बयान हैं ।वह तकलीफ़ ‘मैं अयोध्या’ की है तो कहीं वह तकलीफ़ ‘सत्येन’ की है कहीं ‘स्वर्ग में जीवन नहीं होता’ की है । ‘मैं अयोध्या’ में झुलसता हुआ आम आदमी है ; प्रश्नाकुल एवं असहाय तो सत्येन में अभावों से जूझता वह संतप्त व्यक्ति है जिसकी सारी शक्ति पेट के गड्ढे को भरने में ही चुक जाती है ।उसके व्यक्तित्व को कवि ने इस प्रकार रूपायित किया है-
‘उसका तमतमाता चेहरा
जैसे जेठ की दोपहरी में
दमकता सूरज
जैसे
हिमालय के नीचे
धधकता एक ज्वालामुखी
जैसे
बर्फ़ीले इलाके में
एक गर्म चश्मा’
किसको कितनी आज़ादी मिली है ,क्या काम करने की आज़ादी मिली है ;यह विचारणीय है ।इस सन्दर्भ में सत्येन का यह कड़वा सच इस दौर की त्रासदी ही कहा जाएगा-
‘क्या तुम्हें नज़र नहीं आता
कि हमारी आज़ादियाँ दरअसल
सेठों , नौकरशाहों और राजनेताओं ने
अपनी अंटी में बाँध ली हैं।’

समाज में बहुत परिवर्तन हुआ है ।बहुत कुछ बदल गया है ;परन्तु इंसानी रिश्ते आज भी जिन्दा हैं।‘योगफल’ कविता गाँव के बारे में यही सन्देश देती है-
‘प्रेम और उपकार का भाव
बरसों से
आम और नीम के पेड़ों की तरह
आज भी हरा है यहाँ ’
कवि अपने गाँव में आशा की एक किरण देखता है जो पूरी इंसानियत के लिए एक उजाला है-
‘मेरा गाँव
उजाले की एक खिड़की है
जहाँ से दिखता है
दुनिया का बेहतरीन नज़ारा
एकदम साफ-साफ ’
पूजा’ कवि के अनुसार यदि किसी दुख में डूबे किसी व्यक्ति के कंधे पर हाथ भी रख दिया तो वह किसी पूजा से कम नहीं है । ‘पूजा’ कविता में कवि इसी सत्य को रेखांकित करता है ।
मानव-जीवन संघर्षों से भरा है । संघर्ष हैं तो उनका समाधान भी है ।हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए । समीप जी कहते हैं-
‘नई रोशनी मिल जाएगी
जगनू होंगे ,दीपक होगा
चाँद सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो।’

‘घर लौटा हूँ’ में शहर से घर लौटने की गरमाहट है, जो शहरी बेगानेपन पर भारी है।आदमी ही नहीं घर के अन्य प्राणी भी इसे महसूस करते हैं । दूसरी ओर कवि को चिन्ता है नष्ट होती संवेदना की जिसमें राम की नहीं ,केवल रावण की ऊँचाई बढ़ रही है-
‘सूख रहे हैं
अहसास के कुँए
पीली पड़ रही है
हृदय की हरीतिमा ’
मन के गाँव में
असंतोष ने डाल रखा है डेरा’

यही नहीं आज की तिकड़मी भीड़ में ईमानदार आदमी घुटन महसूस कर रहा है ।उसका अस्तित्व खतरे में है –
जहाँ मासूम ईमानदारी
बेचारे ‘हरसूद’ गाँव की तरह
डूब रही हो धीरे-धीरे
बाँध की क्रूर गहराइयों में
हरसूद और बाँध का प्रतीक कविता की सम्प्रेषणीयता और बढ़ा देता है ।
विकास के वायदे जनता को सदा गुमराह करते हैं। प्रशासन जो हित के काम करना चाहता है , बिचौलिये और भ्रष्ट तन्त्र उसे बीच में ही निगल जाते हैं ।कवि की यही पीड़ा ‘सड़क’कविता में प्रकट हुई है-
‘जाने कहाँ बिलर गई है
सड़क !
कहा तो यही गया था गाँव में
कि राजधानी से
चल पड़ी है सड़क
गाँव के लिए’
‘बिलर’ शब्द अभिव्यक्ति को और धारदार बना देता है। भाषा की यह लौकिकता जनमानस की हताशा को बेहतर ढंग से प्रस्तुत करती है।
‘मैं अयोध्या’की कविताएँ हरेराम ‘समीप’ के व्यापक अनुभव और भाषा पर उनकी गहरी पकड़ का अहसास कराती हैं। श्री राम कुमार कृषक के अनुसार समीप जी ‘निरे बौद्धिक विमर्श के कवि नहीं हैं वे’।कविताओं की भीड़ में यह संग्रह अपनी अलग पहचान बनाएगा; ऐसी आशा है ।

मैं अयोध्या-हरेराम समीप ;प्रकाशक-शब्दालोक ,सी-3/59 ,नागार्जुन नगर ,सादतपुर विस्तार दिल्ली-110094 ,मूल्य-75/- पृष्ठ-120
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Friday, October 12, 2007

लघुकथा में सामाजिक बोध

लघुकथा में सामाजिक बोध

जन जीवन में उठने वाली तरंगों को रूपायित करना, किसी भी विधा की शक्ति का अहसास कराता है। लघुकथा के लिए हम लम्बी–चौड़ी बातें न करके इसके विषय क्षेत्र पर दृष्टिपात करें तो पता चलता है कि यह विधा समाज के दु:ख–दर्द से अन्य विधाओं की तरह ही जुड़ी है। काल के निरन्तर प्रवाह में परम्परा उतनी ही स्वीकार्य हो सकती है जितनी समसामयिक हो, जितनी भावी स्थितियों के लिए उत्तरदायी बन सकती हो। अतीत में जो समस्याएँ थीं, वे ज्यों की त्यों वर्तमान फलक पर नहीं है। कुछ समस्याओं के समाधान खोजे गए हैं तो कुछ नई समस्याएँ भी दिन प्रतिदिन उपजती जा रही हैं। अतीत के सन्दर्भ कभी भटकाव में राह सुझा रहे हैं ,तो कुछ ऐसे भी हैं जो नया भटकाव पैदा कर रहे है। चाहे शिक्षा हो चाहे राजनीति, चाहे व्यक्तिगत जीवन हो, चाहे व्यक्ति से आगे बढ़कर पूरे मानव समाज को समेटने की आतुरता, चाहे चिन्तन हो चाहे कार्यरूप; सभी में क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं। ये परिवर्तन शुभ संकेत एवं अपशकुन दोनों ही रूपों में हैं। लघुकथा ने शुभ संकेत देकर जहाँ आगे बढ़ने के लिए मार्ग प्रशस्त किया है, वहाँ उन अपशकुनों से भी हमें सावधान किया है; जो सामाजिक संवेदना के लिए भयावह हैं।
लघुकथा के क्षेत्र में ऐसे लेखकों की लम्बी सूची है; जिन्होंने सार्थक रचनाओं का सर्जन किया है। इनमें विष्णु प्रभाकर, रमेश बतरा, बलराम, सतीशराज पुष्करणा जगदीश कश्यप, मधुदीप मधुकांत, सुकेश साहनी, अंजना अनिल,शकुन्तला किरण, प्रतिमा श्रीवास्तव,अशोक भाटिया, रूपदेवगुण,शंकरपुणताम्बेकर, उपेन्द्र प्रसाद राय, श्यामसुन्दर अग्रवाल डा0 श्यामसुन्दर दीप्ति, सुभाष नीरव ,युगल ,कृष्णानन्द कृष्ण ,बलराम अग्रवाल आदि प्रमुख हैं।
लघुकथाओं में नारी के विविध रूपों का चित्रण किया गया है। माँ,बहिन,प्रेमिका माँ,बहिन,प्रेमिका,मित्र,पतिता,शोषिता,बेटी, परिवार के लिए रोटी का जुगाड़ करती संघर्षरता ,संतान–पति–प्रेमी आदि द्वारा उपेक्षिता एवं वंचिता। रिश्तों के दायरे को नकारती गुण–दोष की प्रतिमा किन्तु सहजता का जीवन जीने वाली समाज के उपालम्भ सहने वाली। प्रेम करने वाली आनन्दी (कायर: कमलेश भारतीय) से राजीव की यह भावना जैसे ही प्रकट होती है, वह उसकी कठोर भर्त्सना करती है। सुकेश साहनी की लघुकथा ‘मृत्युबोध’ में बूढ़ी सुमित्रा के साथ ठण्डी पथराई पारिवारिक संवेदना केवल मृत्यु का इंतजार कर सकती है, दूसरी ओर ‘गुठलियाँ’ की बिट्टो और बूढ़ी माँ के लिए उपेक्षा को सींचने वाली भी नारी ही है। ‘हिस्से का दूध’ (मधुदीप) की पत्नी तमाम अभावों के बीच पारिवारिक सम्बन्धों की उष्मा बनाए हुए है। ‘जगमगाहट’ (रूपदेवगुण) की नौकरी पेशा युवती हर समय वासना भरी नज़रों से अपना अस्तित्व बचाए रखने के अन्तर्द्वन्द्व को झेलती रहती है। यद्यपि उसकी आशंका निराधार सिद्ध होती है तो भी दफ्तरों में हो रहे यौन शोषण को नकारा नहीं जा सकता है। ‘विश्वास’ (पुष्करणा) की पत्नी को अपने पति की लम्पटता का पता नहीं । वह उस पर इतना विश्वास करती है कि उसके हाथ से जहर भी पी सकती है।
डॉ. कमल चोपड़ा ने ‘सीधी बात’ में लड़की की सामाजिक उपेक्षा को रेखांकित किया है तो ‘खेल’ में देहशोषण की त्रासद स्थितियों को चित्रित किया है। ‘पाप और प्रायश्चित’ (बलराम) में उन तथाकथित धार्मिक विधि निषेधों पर उंगली उठाई है जिनके कारण प्यार और मातृत्व को पाप मानने की भावना पनप सकती है। ‘लड़की (डॉ.उपेन्द्र प्रसाद राय) में विभिन्न स्तरों पर शोषित एक लड़की की करुण कथा है। लड़की को उपभोग की सामग्री समझने वालों के मुँह पर एक करारा तमाचाहै । ‘नारी’ में नारी को भोग्या मानने वाले रुग्ण संस्कारों पर चोट की है। डॉ.शकुन्तला किरण ने ‘रूपरेखा’ और ‘मौखिक परीक्षा’ में छात्राओं के शोषण के जिम्मेदार शिक्षकों पर चोट की है। ‘तार’ में प्रेम की गहराई को, रिश्तों के अपरिभाषित सूत्रों को व्यंजित किया है। सारे सिद्धान्त इसकी गूँज के सामने मूक हो जाने के लिए बाध्य हैं।
धर्म का स्थान कट्टरता और उग्र साम्प्रदायिकता ने ले लिया है। राजनीति इन दोनों में फर्क नहीं करती। वह स्वार्थ पूर्ति के लिए किसी भी विषबेल को मानवमात्र की आवश्यकता कहकर रोप सकती है। जनमानस को दूषित करने वाले लोग असहिष्णुता को बढ़ाने वाले अवसर तलाशते रहते हैं। घोर साम्प्रदायिकता का घिनौना जानवर जब हमारे मन को विकृति की ओर ले जाता है, तभी नफरत फैलती है। हम इस जानवर को न मारकर, उस बेचारे सीधे–सादे आदमी को कत्ल करने में इतिश्री मान बैठते हैं, जो किसी विशेष वर्ग से जुड़ा है। रमेश बतरा की लघुकथा ‘सूअर’ बड़ी सादगी से साम्प्रदायिक प्रश्नों का उत्तर देती है। ‘‘मस्जिद में सूअर घुस आया’’ का उत्तर करवट लेकर फिर से सोता आदमी देता है–‘‘यहाँ क्या कर रहे हो?.....जाकर सूअर को मारो न!’’ ‘छोनू’ (कमल चोपड़ा) का बच्चा जब साम्प्रदायिकता का शिकार होने लगता है तो भयाक्रांत हो उठता है–‘‘मैं छिक्ख–छुक्ख नई ऊँ...मैं तो छोनू हूँ...।’’ न जाने कितने निरीह सोनू अन्धी सुरंग में ढकेले जा रहे हैं। साम्प्रदायिक विद्वेष के मूल में प्राय: भय और अफवाहें होती है। ‘आइसबर्ग’ (सुकेश साहनी) में भीड़ के इस मनोविज्ञान का सूक्ष्म विश्लेषण किया गया है। उसकी शहादत (जगदीश कश्यप) ‘आदमी’ (बलराम) दिशा (पुष्करणा) भी प्रभावशाली लघुकथाएँ हैं।
जातिवाद ने साम्प्रदायिकता की तरह ही घृणा का प्रसार किया। धनी–निर्धन, धर्म–विधर्म के बीच पिसते लोग अब ऊँच–नीच के दायरे में बँटकर उपेक्षा,शत्रुता का प्रतिशोध आदि अमानवीय चिन्तन से विभाजित होने लगे हैं। शोषित ओर पीड़ित की व्यथा को लघुकथा ने स्वर प्रदान किया है। ‘पहला आश्चर्य’ (चोपड़ा) गरीबी की करुण पीड़ा को व्यक्त करती है तो आँधी (चित्रेश) में गरीब बनाने की तिकड़म का कड़ा प्रतिरोध उभरा है। ‘मृगजल’ (बलराम) में भविष्य के असंभावित सुख की कल्पना में खोया वर्तमान में दुर्दशाग्रस्त जीवन जीने वाला कृष्ण का परिवार है। ‘प्रश्नहीन’ (कमलेश भट्ट कमल) में बेरोजगारी की छटपटाहट, बैकुंठ लाभ (कुमार नरेन्द्र) में दिहाड़ी की विवशता में घुटता सामाजिक दायित्व ‘पेट पर लात’ (विक्रम सोनी) में मजदूर की दयनीय दशा का चित्रण किया गया है।
हमारे समाज में बहुत सारी विद्रूपताएँ हैं। हम उन्हें देखकर सतही तौर पर हँस सकते हें परन्तु गहराई से सोचें तो छटपटाहट होती है। हमारे आसपास के बहुत सारे चेहरों, परिस्थितियों एवं सिद्धान्तों के खोखले आदर्श का मिथक टूटता नज़र आता है। शिक्षा–जगत को ही लेँ–अभिभावक की जल्दबाजी बच्चे के बचपन को छीन ले रही है। ‘सपना’ में (अशोक भाटिया) ने इस स्थिति पर करारा व्यंग्य किया है। चिडि़याघर (श्यामसुन्दर अग्रवाल) में स्कूलों की दुर्दशा, बैल (साहनी) में बाल मानसिकता को न समझ पाने की भूल, ‘कितना बड़ा मूल्य’ (डा0राय) में अनुशासन के ढोंग की ओट में नन्हे–मुन्नों की कुचली सहज भावनाओं की प्रतिध्वनि मन पर खरोंच छोड़ जाती है।
आर्थिक और सांस्कृतिक दबाव में आकर मनुष्य का स्वार्थ और प्रबल हुआ है। यही कारण है कि पारिवारिक रिश्तों की गर्माहट कम होने लगी है। कमल चोपड़ा ने ।माँ पराई लघुकथाओं में इस टूटन को उजागर किया है तो ‘अंत तक’ में उसी टूटन को जोड़ने का प्रयास किया है। बलराम,शंकर पुणताम्बेकर और डा0 राय की लघुकथाओं में राजनैतिक छल- प्रपंचों पर कड़ा प्रहार किया गया है।
इस प्रकार लघुकथा के बहुआयामी विषय चयन के आधार पर हम कह सकते हैं कि यह विधा सामाजिक बोध से अन्य विधाओं की तरह अन्तरंगता से जुड़ी है।

अरबी-फ़ारसी और उर्दू की लघुकथाएँ

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’लघुकथा ने अनेक अन्तर्विरोधों और उपेक्षाओं से जूझते हुए अपना मार्ग तय किया है। धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर अविभाजित होकर कैसे संघर्ष करें, मानवता के मार्ग में अवरोध बनने वाली विषम परिस्थितियों को कैसे बदला जाए; इन सबका उत्तर लघुकथा देती है। इस संकलन की विभिन्न लघुकथाएँ देश काल और परिस्थितियों को लाँघकर एक साझा संस्कृति की तलाश में अग्रसर हैं। साम्प्रदायिक एवं भौगोलिक आधार पर प्रकटत: दिखाई देने वाला विभाजन वैचारिक स्तर पर बेमानी सिद्ध हो रहा है।
इस संकलन में 23 रचनाकारों की 167 कथाएँ हैं जिनमें से अधिकतर को लघुकथा की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये लघुकथाएँ जहाँ अपनी विकासयात्रा का आभास कराती है। वहीं अपने दायित्वबोध के कारण सभी सीमाओं को तोड़कर प्रासंगिकता से जुड़ी हैं। ये अरबी फारसी और उर्दू की लघुकथाएँ अपने विषयबोध और शिल्प के कारण अनायास ही हिन्दी लघुकथा से अद्भुत साम्य स्थापित किए हुए हैं।
खलील जिब्रान की लघुकथाएँ जीवन का व्यापक अनुभव समेटे हुए हैं। अन्ध विश्वास जड़ता का जनक है। ‘वह पवित्र नगर’ इसी सड़ी गली दम तोड़ती आस्था पर व्यंग्य है। बच्चों के माध्यम से लेखक ने अबोधता को ही निश्छलता और सहज ज्ञान का दृढ़ आधार माना है। ईश्वरीय आदेश महज़ कुछ कुण्ठित दिमागों की उपज़ है। ‘आँसू और हँसी’ में मानवेतर पात्र मगर और लकड़बग्घे के माध्यम से सहज जीवन जीने वालों की पीड़ा का चित्र है। आत्मीय सम्बन्धों में नफरत को भी स्वीकार्य मान लेना सच्चा लगाव है। लेखक ने ‘लगाव’ लघुकथा में इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक ढंग से विश्लेषित किया है।दूसरों की पीड़ा में सुख का अनुभव करने वाले, डराने के आनन्द को सर्वोपरि समझकर जीने वाले लोग अपने खोखले और आरोपित व्यक्त्वि को सदा के लिए बरकरार नहीं रख पाते। ‘विजूका’ में इसी खोखलेपन को चुनौती देकर, उसने डराने वालों की दयनीयता प्रकट की है। विजूके के सिर पर घोंसला बनाकर कौए उसे उसके खोखलेपन का आभास करा देते हैं। विश्व में आतंक मचाने वालों की यही परिणति हुई है। ‘ दो बच्चे’ में शोषण पीडि़त समाज का यथार्थ मुखर है तो ‘न्याय का तकाज़ा’ में न्याय की विवेकशून्यता पर तीखा प्रहार है। सुनी सुनाई बातों को पूर्ण सत्य मानने वाले नहीं समझ पाते ​कि वे अनुमान के आधार पर सच्चाई को दफन कर रहे हैं। ‘अनुमान’ इसी भेड़चाल पर व्यंग्य है। ‘मूर्खों का ज्ञान’ में बताया गया है कि विवेक- शून्य लोगों के बीच रहकर कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभाई जा सकती। मूर्ख लोग अपनी दुबु‍र्द्धि को ही परम ज्ञान समझ बैठते हैं।
श्रेष्ठ कार्य करने के लिए पीड़ादायक मार्ग से गुजरना पड़ता है।कठोर परिश्रम ही जीवन का सत्य ह॥ निरन्तर चुनौतियों से जूझना ही जीवन्तता है।ख़लील जिब्रान ने ‘प्रसव पीड़ा’ और ‘हीरा और पत्थर’ लघुकथाओं में इस दर्शन की पुष्टि की है। ‘वास्तविक सुख’ दाम्पत्य जीवन की विडम्बना का लेखाजोखा है। इन लघुकथाओं में लेखक का दार्शनिक रूप् अपेक्षाकृत अधिक मुखर है। हर्ष और शोक एक ही सिक्के के दो पहलू है। दोनों ही अनिवार्य सत्य है।‘हर्ष और शोक’ लघुकथा इस तथ्य की पुष्टि करती है। ‘पागलखाना’,शांति और शोर’ ‘लेना–देना’ लघुकथाओं में क्रमश: सहज विकास में बाधा बनने वालों, कथनी–करनी में एकरूपता न रखने वालों तथा थोपे गए उपदेशों को सर्वस्व मानने वालों पर व्यंग्य है।
‘अंतिम संदेश’ आधुनिक राजनीति युद्धप्रियता और क्षेत्रीयता की बुराइयों का उल्लेख करती है।
डॉ0 तहा हुसैन की लघुकथाएँ ‘भाग्य लेख’ और गधा’ ईश्वर की समता मूलक दृष्टि एवं आचरण पर आधारित धर्म की पुष्टि करती है। ‘गोद का बच्चा’ लघुकथा न होकर–केवल व्यंग्य–प्रसंग है। मु0 हलीम अब्दुल्ला ने ‘ध्वनि–प्रतिध्वनि’ वैवाहिक सम्बन्धों का विश्लेषण करती कथा है। यह रचना कहानी के अधिक निकट है।
‘फतूमा’ शिल्प की दृष्टि से सफल लघुकथा है। अब्दुल मलिक नूरी ने 25 वर्षों के घटनाक्रम को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित किया है। फतूमा के लिए लड़कियों को जन्म देना अभिशाप बन गया है। आज एशियाई क्षेत्र की हर फतूमा इस अभिशाप से ग्रस्त है। यह चरित्र सभी उपेक्षित नारियों का प्रतिनिधित्व करता है।
नजीब महफूज की लघुकथाएँ–अल्लाह की मर्जी ,इल्जाम, बंदगली कथ्य एवं प्रस्तुति दोनों ही दृष्टियों से साधारण हैं। मो0 तैमूर की लघुकथा ‘रेलगाड़ी’ में उस रुग्ण चिन्तन पर प्रहार है जो लोक कल्याणकारी कार्यों को व्यर्थ समझते हैं। इस रचना में सत्ताधारी वर्ग का समर्थन करने वालों की बदनीयती पर करारा प्रहार हे। समीरा माइने ने प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृति के नारी विषयक चिन्तन को ‘वार्तालाप’ लघुकथा में रेखांकित किया है।
शेखसादी की कथाएँ दृष्टान्त, नीतिकथा, प्रेरक प्रसंग के अधिक करीब हैं। फिर भी आज की लघुकथाओं का बीजरूप इन कथाओं में तलाशा जा सकता है। ‘अपनी कमाई’ में श्रम की महत्ता तथा ‘कविता’ में सच्ची कविता के यथार्थपरक होने की पुष्टि की गई है।
फारसी कथाकार मोहसिन मीहन दोस्त की सभी कथाएँ लोककथा शैली में लिखी गई हैं। ये कथाएँ लघुकथाएँ नहीं बन पाई हैं ‘बुद्धिमान’ कथा तो विश्वप्रसिद्ध लोक कथाओं में से एक है।
ए0 जी0 केल्सी की रचना ‘बोझ’ चुटकुला मात्र है। ‘भूख का ईमान’ अच्छी लघुकथा है। भूख का ईमान से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
मंटो की लघुकथाएँ साम्प्रदायिक सोच पर कड़ा प्रहार करती हैं। क्रूरता मनुष्य को राक्षस की श्रेणी में खड़ा कर देती है। बेखबरी का फायदा,घाटे का सौदा, सफाई पसन्द, मुनासिब कार्रवाई लघुकथाएँ अहिंसा की विडम्बना और क्रूरता के विस्तार की पीड़ा सँजोए हैं।
राजिन्दर सिंह वेदी की लघुकथा ‘घटनाएँ’ तथा जोगिन्दर पाल की आगमन ,ताल, मशीन श्रेष्ठ लघुकथाएँ है। डॉ0 इकबाल हसन आजाद की लघुकथा ‘लायकान’ हमारे दैनिक जीवन से धर्म के निष्कासन की पीड़ा सँजोए है। घर में सैक्स की पुस्तकों के लिए जगह है पर पवित्र पुस्तक के लिए एक कोना भी नहीं है। स्थानाभाव के कारण पवित्र पुस्तक मस्जिद में भेज दी जाती है। दूसरी लघुकथा ‘इंकलाब’ में नारेबाजी और हड़ताल की परिणति प्रस्तुत की है।
चाँदनी डा0 जाकिर हुसैन की कहानी है। ‘कुत्ता’ और उल्लू’ इब्ने इंशा के व्यंग्य हैं। लघुकथा नहीं बन सके है।
हाँ, ‘अलग देश’ वार्तालाप शैली में लिखी इनकी एक श्रेष्ठ लघुकथा है। लेखक ने द्विराष्ट्र के सिद्धान्त पर तीखी चोट की है। अलग देश क्यों बनाया गया का उत्तर तीखा एवं मर्मस्पर्शी है–‘गलती हुई। माफ कर दीजिए। अब कभी नहीं बनाएँगे।’
मु0 इलियास ने अपनी लघुकथा ‘कद्र’ में देह व्यापार से ऐशो आराम की जिन्दगी बिताने वालों की मनोवृत्ति बिना नफरत जगाए उद्घाटित किया है। महबूब ,नजर फातमा ,हनीफ बाबा और अफजल अहसन शाद की लघुकथाएँ साधारण हैं।
इस संकलन का कुछ रचनाओं के कमजोर होने से महत्त्व कम नहीं हो जाता। जब तक विभिन्न देशों और भाषाओं की लघुकथाएँ हमारे सामने नहीं होंगी तब तक हम हिन्दी लघुकथाओं का वस्तुपरक मूल्यांकन नहीं कर पाएँगे।यह संकलन एक साझा संस्कृति की तलाश है । इन लघुकथाओं में हम आज के समाज का सच्चा चित्र देख सकते हैं। हिन्दी पाठकों को विश्वस्तर की इतनी लघुकथाएँ सौंपकर सम्पादक द्वय ने जो श्लाध्य प्रयास किया है, उसके लिए हिन्दी लघुकथा जगत निश्चित रूप से आभारी रहेगा।
………………………………………………………………………………………………………………………… वह पवित्र नगर : सम्पादक द्वय सर्वश्री बलराम एवं सुकेश साहनी ;राष्ट्र भाषा प्रकाशन ,518/6बी विश्वास नगर शाहदरा दिल्ली-110032 ;मूल्य 70 रुपए ;पृष्ठ :144 ;संस्करण :1993
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