Tuesday, March 27, 2007

बाल-जगत

हम चाँद बनेंगे

हम चाँद बनेंगे
अँधियारे में
पथ दिखलाएँगे
हम बन कर तारे
सूने नभ में
फूल खिलाएँगे ।

हम बनकर सूरज
नया उजाला
लेकर आएँगे ।
हम बनकर भौंरे
उपवन-उपवन
गीत सुनाएँगे ।

हम फूल बनेंगे
प्यारी खुशबू
रोज लुटाएँगे ।
अब हमने ठाना
इस धरती को
स्वर्ग बनाएँगे ।
…………………………………………

सूरज का गुस्सा

सूरज को गुस्सा आता
धरती को जड़ता चाँटे ।
मन में जितनी आग भरी
सारी दुनिया को बाँटे ।

झुलसे पेड़ों के पत्ते
पौधे सारे कुम्हलाए ।
प्यासे गैया-बकरी भी
पानी-पानी चिल्लाए ।

चीख सुनी जब बादल ने
दौड़ा-दौड़ा वह आया ।
दशा देखकर धरती की
जीभर पानी बरसाया ।
……………………………………………

सबसे प्यारे

सूरज मुझको लगता प्यारा
लेकर आता है उजियारा ।
सूरज से भी लगते प्यारे
टिम-टिम करते नन्हें तारे।
तारों से भी प्यारा अम्बर
बाँटे खुशियाँ झोली भर-भर।
चन्दा अम्बर से भी प्यारा
गोरा चिट्टा और दुलारा ।
चन्दा से भी प्यारी धरती
जिस पर नदियाँ कल-कल करती ।
पेड़ों की हरियाली ओढ़े
हम सबके है मन को हरती ।
हँसी दूध –सी जोश नदी –सा
भोले मुखड़े मन के सच्चे ।
धरती से प्यारे भी लगते
खिल-खिल करते नन्हें बच्चे ।
इन बच्चों में राम बसे हैं
ये ही अपने किशन कन्हाई ।
इन बच्चों में काबा-काशी
और नहीं है तीरथ है भाई ।
०००००००००००००००

खेल-गीत -
अक्कड़-बक्कड़

अक्कड़-बक्कड़ बम्बे बो
आसमान में बादल सौ ।
सौ बादल हैं प्यारे
रंग हैं जिनके न्यारे ।

हर बादल की भेड़ें सौ
हर भेड़ के रंग हैं दो ।
भेड़ें दौड़ लगाती हैं
नहीं पकड़ में आती हैं ।

बादल थककर चूर हुआ
रोने को मज़बूर हुआ ।
आँसू धरती पर आए
नन्हें पौधे हरषाए ।

Sunday, March 25, 2007

आस न छोड़ो;हरे राम ‘समीप’


हरे राम ‘समीप’

मुश्किल आई है
तो क्या
वह भी जल्दी हट जाएगी
घुप्प अँधेरे कमरे में यूँ
मुश्किल ओढ़े
अवसादों से
घिरे हुए तुम
घबराए-से
क्यों बैठे हो!

ज़रा टटोलो
दीवारों को
उम्मीदों की अँगुलियों के
कोमल ज़िन्दा इन पोरों से
आहिस्ता-आहिस्ता खोजो
हाथों से दीवार न छोड़ो ।

कमरे की इन दीवारों में
कोई खिड़की निश्चित होगी
जिसके बाहर
बाँह पसारे,स्वागत करने
नई रोशनी मिल जाएगी
जुगनू होंगे , दीपक होगा
चाँद –सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो ।

मुश्किल में तुम
आस न छोड़ो ।
(मैं अयोध्या…संग्रह से साभार)

Monday, March 19, 2007

आज का चिन्तन

बीमार सोचबीमार सोच को ढोने वाले लोग हर क्षेत्र में मिल जाएँगे ।सुबह जागकर अख़बार में चोरी ,डकैती ,हत्या ,लूट ,दुर्घटना की ख़बर तलाश करना ; दिन भर ऐसी ख़बरों के वर्णन में अपनी सारी ताकत झोंक देना कुछ लोगों का शगल बन गया है ।दूसरी श्रेणी में वे भले लोग हैं ;जो बुरी ख़बर को ‘आज का चिन्तन’ की सुबह ही सुबह परिचितों को सुनाएँगे ।उस समय उनकी मुखमुद्रा एक सुलझे हुए सन्त जैसी लगेगी ।वे अपनी बात के कुप्रभाव से पूरी तरह निरीह रूप से अनजान होते हैं ।इसी तरह की नकारात्मक सोच हमारे शिक्षा –जगत् की भी सबसे बड़ी खामी है । ऐसा तभी होता है ;जब व्यक्ति अपने वर्तमान से ऊपर नहीं उठ पाता है ,अपने अतीत से मुक्त नहीं हो पाता है ।आने वाले समय के लिए न योजना बना सकता है ,न उन्हें लागू करने का ख़तरा उठा सकता है ।अपने अतीत के प्रक्षेपण से पूरे भविष्य को आच्छादित करना चाहता है । अपनी नकारात्मक सोच से पूरे विश्व को नरक बनाने का उद्यम ज़रूर कर लेता है ; लेकिन छोटे –से प्रयास से फूल देने वाला का एक पौधा लगाने में अपना अपमान समझने लगता है । ऐसे बीमार लोग इस देश में बहुतायत से पाए जाते हैं । हंगामा और हड़ताल करने में ज़मीन -आसमान के कुलाबे मिला सकते हैं। घण्टों बेकार की बातों पर बहस कर सकते हैं ,कुतर्क की कीचड़ में गोता लगा सकते हैं ;लेकिन सड़क पर घायल पड़े आदमी को अस्पताल नहीं पहुँचा सकते ।ज्ञान को कैद करके कालकोठरी में डाल सकते हैं,उजाले के पैरों में बेड़ी पहना सकते हैं ;परन्तु उजाले को बेरोकटोक बाहर नही जाने देंगे ।इन बीमार सोच वाले लोगों ने भावी पीढ़ी का जीवन बहुत कठिन कर दिया है। निरन्तर नया सोचने वालों और करने वालों को कदम –कदम पर प्रतिरोध का सामना करना पड़ता है अपनी कुण्ठा को छात्रों पर लादना कायरता ही नहीं वरन् अपने सामाजिक दायित्वों की उपेक्षा है ।इसका कुप्रभाव निकट भविष्य में शिक्षा-जगत को प्रभावित किए बिना नही रहेगा ।
बीमार सोच वाले लोग हमारे किशोरों को क्या देंगे ? हताशा निराशा और कुण्ठा के सिवाय शायद ही कुछ दे पाएँ । यदि हमें इनका भविष्य बचाना है तो सकारात्मक सोच को बढ़ावा देना पड़ेगा ।प्रयास करना होगा कि स्वस्थ मानसिकता वाले लोग ही शिक्षा के क्षेत्र में आएँ । युवा पीढ़ी के सामने सबसे बड़ा संकट आदर्श का है । शिक्षक अगर उनका आदर्श बनने में असमर्थ है तो फिर इस दायित्व को कौन सँभालेगा ? संभवत कोई नहीं ।आस्था और निर्माण की विचारधारा रखने वाले लोग भारत के भविष्य का निर्माण करने के लिए आगे आएँ ;तभी यह नई पीढ़ी सही दिशा में आगे बढ़ सकेगी । निदा फाज़ली के शब्दों में कहें तो यह समीचीन होगा :-
‘घर से मस्ज़िद है बहुत दूर तो चलों यूँ कर लें
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।’

Sunday, March 18, 2007

सम्पर्क-सूत्र

आप अपनी रचनाएँ यूनिकोड में(यूनिकोड सुविधा न होने पर कृतिदेव या शुषामें) टाइप कराकर निम्नलिखित पते पर ई मेल कर सकते हैं।किसी प्रकार के मानदेय की व्यवस्था नहीं है। रचना मौलिक होनी चाहिए । नकारात्मक सोच की रचना न भेजें ।
rdkamboj@gmail.com

मेरी पसन्द

पूर्णिमा वर्मन के नवगीतमर्मस्पर्शी किन्तु सहज-सरल भाषा में अपनी बात कहना सबसे कठिन काम है । भाषा की लम्बी साधना से ही यह सिद्धि प्राप्त हो सकती है ।जीवन की जटिलताओं को आत्मीय भाव से हृदय तक पहुँचाना इस आपाधापी के युग में तो और भी असाध्य है । पूर्णिमा वर्मन ऐसा नाम है जो आज रची जा रही कविताओं में पूरी ऊष्मा के साथ अपनी छाप छोड़ने में सक्षम है । ‘यह हुई न कविता’बरबस ही पाठक कह उठेगा ।पाठक –प्रिय साहित्य ही लोकप्रिय हो सकता है ।जो गिने-चुने लोगों के लिए लिख रहें हैं ,उनकी रचनाएँ या तो पाठयक्रम मे जुड़कर विद्यार्थियों में अरुचि पैदा कर सकती हैं या पुस्तकालयों की अल्मारियों की शोभा बढ़ाकर कालान्तर में दीमकों का आहार बन सकती हैं । पूर्णिमा वर्मन की रचनाएँ www.anubhuti-hindi.org पर देखी जा सकती हैं।-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ .

Thursday, March 15, 2007

इंसान की बातें

इंसान की बातें

आदमी को चुभ रही इंसान की बातें ।
आज लगती तीर –सी ईमान की बातें ॥

जो किनारों पर रहे तूफ़ान के डर से ।
आज वे करने लगे तूफ़ान की बातें ॥

हर दिन बाज़ार में काम उनका बेचना ।
हर जगह भाती उन्हें दूकान की बातें ॥

जो अर्से तक रहे यहाँ अर्दली बनकर ।
आज वे करने लगे पहचान की बातें ॥

भूख से दम तोड़ती चिथड़ों बँधी गठरी ।
पेट क्या उसका भरें भगवान की बातें ॥

यार से पूछी कुशल घर –गाँव की हमने ।
उसने कही लाश की ,किरपान की बातें ॥

………………

Monday, March 12, 2007

मैं घर लौटा,


बहुत मैं घूमा पर्वत -­पर्वत
नदी घाट पर बहुत नहाया
और पिया तीरथ का पानी
आग नहीं मन की बुझ पाई।
बहुत नवाया मैंने माथा
मंदिर और मजारों पर भी
खोज न पाया अपने मन का चैन जरा भी ।
रेगिस्तानों में चलाकर के
दूर गया मैं सूनेपन तक
आग मिली बस आग मिली थी।
मैं लौटा सब फ़ेंक ­फान्काकर
भगवा चोला और कमंडल
और खोजने की बेचैनी
उन सबको जो नहीं पास थे
पहले मेरे।
मैं घर लौटा।
आकर बैठा था आंगन में
टूटी खटिया पेड नीम का
बिटिया आयी दौदी­ दौदी
दुबकी गोदी में वह आकर
पत्नी आयी सहज भाव से
और छुआ मुझको धीरे से।
बरस पडी जैसे शीतलता
और चांदनी भीनी­ भीनी
मेरे छोटे से आंगन में ।
मैं मूरख था ,
अब तक भटका
बाहर-बाहर।
झाँक न पाया था भीतर मैं
पावन मन्दिर , तीर्थ जहाँ था
और जहाँ थे ऊँचे पर्वत
शीतल ­शीतल ,
और भावना की नदियाँ थीं
कल­कल करती
छल ­छल बहती।
झोंके खुशबू के
भरे हुए थे , बात ­बात में।
जुड़े हुए थे हम सब ऐसे
नाखून जुड़े हो
साथ मांस के
युगों ­युगों से ।


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जरूरी है

जीवन के लिए जरूरी है
थोडी़ - सी छाँव
थोडी़- सी धूप।
थोडी़ - सा प्यार
थोडी़- सा रूप।
जीवन के लिए जरूरी है…
थोडा़ तकरार
थोड़ी मनुहार।
थोड़े -से शूल
अँजुरीभर फूल।
जीवन के लिए जरूरी है…
दो चार आँसू
थोड़ी मुस्कान।
थोड़ी - सा दर्द
थोड़े------- से गान।
जीवन के लिए जरूरी है…
उजली- सी भोर
सतरंगी शाम।
हाथों को काम
तन को आराम।
जीवन के लिए जरूरी है…
आँगन के पार
खुला हो द्वार।
अनाम पदचाप
तनिक इन्तजार।
जीवन के लिए जरूरी है …
निन्दा की धूल
उड़ा रहे मीत।
कभी ­ कभी हार
कभी ­ कभी जीत।

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3 -बहता जल

हम तो बहता जल नदिया का
अपनी यही कहानी बाबा।
ठोकर खाना उठना गिरना
अपनी कथा पुरानी बाबा।
कब भोर हुई कब साँझ हुई
आई कहाँ जवानी बाबा।
तीरथ हो या नदी घाट पर
हम तो केवल पानी बाबा।
जो भी पाया, वही लुटाया
ऐसे औघड, दानी बाबा।
अपने किस्से भूख­ प्यास के
कहीं न राजा रानी बाबा।
घाव पीठ पर , मन पर अनगिन
हमको मिली निशानी बाबा।
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Sunday, March 11, 2007

कविता


!

बेटियों की मुस्कान 
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


बेटियों की मुस्कान –
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान ,
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान ,
जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।
मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर -
रूठ जाएँगी ॠचाएँ ,
डूब जाएँगे सातों स्वर ,
रूठ जाएगी शीतल छाया ,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।

-0-


Monday, March 5, 2007

Sunday, March 4, 2007

परिचय

रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'

जन्म : 19 मार्च 1949 , ग्राम हरिपुर , तहसील बेहट , जि0 सहारनपुर (उ0प्र0)
शिक्षा
: एम0 ए0 (हिन्दी ) मेरठ विश्वविद्यालय से प्रथम श्रेणी में(प्राइवेट),बी0 एड्0
प्रकाशित रचनाएँ : माटी ,पानी और हवा ,अँजुरी भर आसीस ,कुकड़ू कूँ ,हुआ सवेरा
( कविता संग्रह)
धरती के आँसू ,दीपा , दूसरा सवेरा( लघु उपन्यास )
असभ्य नगर (लघुकथा संग्रह ),खूँटी पर टँगी आत्मा (व्यंग्य संग्रह)
अनेक संकलनों में लघुकथाएँ संकलित ।गुजराती ,पंजाबी ,उर्दू एवं नेपाली में अनूदित । ‘कवि के चगुल में’-नाटक (आकाशवाणी जबलपुर से प्रसारित)
प्रसारण : आकाशवाणी गुवाहाटी ,नज़ीबाबाद , रामपुर
, अम्बिकापुर,एवं जबलपुर के केन्द्रों से कविताएँ ,व्यंग्य ,वार्त्ताएँ ,परिचर्चाएँ प्रसारित।
लघुकथा के क्षेत्र में कई पुरस्कार प्राप्त।
हिन्दी के कई शिविरों में निदेशक के रूप में कार्य ।
सम्प्रति : प्राचार्य , केन्द्रीय विद्यालय आयुध उपस्कर निर्माणी हज़रतपुर जि0 फ़िरोज़ाबाद (उ0प्र0 ) 283103

Saturday, March 3, 2007

नवगीत (navgeet)

नवगीत

गाँव अपना 


पहले इतना
था कभी न
गाँव अपना
अब पराया हो गया ।
खिलखिलाता
सिर उठाए
वृद्ध जो, बरगद
कभी का सो गया ।
अब न गाता
कोई आल्हा
बैठकर चौपाल में
मुस्कान बन्दी
हो गई
बहेलिए के जाल में
अदालतों की
फ़ाइलों में
बन्द हो ,
भाईचारा खो गया ।
दौंगड़ा
अब न किसी के
सूखते मन को भिगोता
और धागा
न यहाँ
बिखरे हुए मनके पिरोता
कौन जाने
देहरी पर
एक बोझिल
स्याह चुप्पी बो गया।

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2 - उदास छाँव
नीम पर बैठकर नहीं खुजलाता
कौआ अब अपनी पाँखें
उदास उदास है अब
नीम तले की शीतल छाँव ।
पनघट पर आती
कोई राधा
अब न बतियाती
पनियारी हैं आँखें
अभिशप्त से हैं अधर
विधुर-सा लगता सारा गाँव।
सब अपने में खोए
मर भी जाए कोई
छुपकर निपट अकेला
हर अन्तस् रोए
चौपालों में छाया
श्मशानी सन्नाटा
लगता किसी तक्षक ने
चुपके से काटा ,
ठिठक ­ठिठक जाते
चबूतरे पर चढ़ते पाँव ।
न जवानों की टोली
गाती कोई गीत
हुए यतीम अखाड़े
रेतीली दीवार- सी
ढह गई
आपस की प्रीत
गली- गली में घूमता
भूखे बाघ -सा अभाव ।
......................

3 -दिन डूबादिन डूबा
नावों के
सिमट गए पाल।
खिंच गई नभ में
धुएँ की लकीर
चढ़ गई
तट पर
लहरों की पीर
डबडबाई
आँख- सा
सिहर गया ताल ।
थककर
रुक गई
बाट की ढलान ,
गुमसुम
सो गया
चूर ­चूर गान
हिलते रहे
याद के
दूर तक रूमाल ।
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4-इस शहर मेंपत्थरों के
इस शहर में
मैं जब से आ गया हूँ ;
बहुत गहरी
चोट मन पर
और तन पर खा गया हूँ ।
अमराई को न
भूल पाया
न कोयल की ॠचाएँ ;
हृदय से
लिपटी हुई हैं
भोर की शीतल हवाएँ ।
बीता हुआ
हर एक पल
याद में मैं पा गया हूँ ।
शहर लिपटा
है धुएँ में ,
भीड़ में
सब हैं अकेले ;
स्वार्थ की है
धूप गहरी
कपट के हैं
क्रूर मेले ।
बैठकर
सुनसान घर में
दर्द मैं
सहला गया हूँ ।



शुभकामनाएँ !

कोई नहीं उदास हो

सोए मन में रह-रह करके
अंकुर फूटे आस के ।
जंगल पर मदहोशी छाई
दहके फूल पलाश के ।।
रंगों का त्यौहार मनाने
धरती भाव- विभोर है ।
झोली भर-भर खुशबू लेकर
फूल खिले चहुँ ओर हैं ॥
होली की लपटों में सारे
भेद-भाव का नाश हो ।
सबके चेहरों पर गुलाल हो
कोई नहीं उदास हो ॥
-0-
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

समीक्षा


असभ्य नगर (लघुकथा -संग्रह)
समीक्षक-डॉ० हृदय नारायण उपाध्याय
कथा साहित्य के शैलीगत क्रमिक विकास का महत्त्वपूर्ण सोपान 'लघुकथा' आज लोकप्रिय प्रतिष्ठित विधा बन चुकी है।इस विधा को गति एवं दिशा देने में जिन महत्त्वपूर्ण लघुकथाकारों का नाम लिया जा सकता ; उनमें रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' उल्लेखनीय हैं।शास्त्रीयता के आडम्बरों से निरपेक्ष इनकी लघुकथाओं में परिमार्जित दृष्टि एवं सहज अभिव्यक्ति का आभास मिलता है।आम मध्यमवगीर्य संवेदनशील मानव की वर्तमान जीवन की भागदौड़ एवं कशमकश से दो- चार होने की सहज कलात्मक अभिव्यक्ति ही हिमांशु जी की लघुकथाओं की पहचान है।
'असभ्यनगर' हिमांशु जी की ६२ लघुकथाओं का एक ऐसा ही संग्रह है ;जिसमें जीवन और समाज के उन समग्र पक्षों का उदघाटन किया गया है ;जिनसे एक जागरूक मनुष्य दो- चार होता रहता है। रचनाकार ने अनुभूति की सच्चाई को पूर्ण जिम्मेदारी के साथ उसके सही सन्दर्भों में कलात्मक अभिव्यक्ति देने की कोशिश की है ; जो पाठकों को सोचने और विचारने पर मज़बूर करती हैं।इस संग्रह की कुछ लघुकथाएँ तो कालजयी हैं, जैसे ऊँचाई ,खुशबू ,धर्मनिरपेक्ष, गंगा ,वफा़दारी ,चक्रव्यूह ,असभ्यनगर आदि। भाव एवं विचार का सही सन्तुलन एवं कलात्मक गठन की उत्कृष्टता ने इन लघुकथाओं को विश्व की किसी भी भाषा की उत्कृष्ट लघुकथाओं की कोटि में ला खड़ा किया है।
इस संग्रह में जीवन और समाज के हर पक्ष को बड़ी बारीकी से देखा और परखा गया है।जीवन और समाज की विसंगतियों एवं समय के कटु यथार्थ से साक्षात्कार कराती ये लघुकथाएँ लगता है हम , आप ,सबका देखा एवं महसूस किया सच हैं।धर्म के नाम पर की गई ठगी ,राजनैतिक भ्रष्टाचार ,साम्प्रदायिक उन्माद फैलाने की साजिश हो अथवा समाज सुधार के नाम पर धोखा ,विवेकहीन स्वार्थान्धता की दौड़ हो अथवा रिश्तों के नाम पर पहुँचाने वाली आत्मीय चोट ,हर कदम पर एक सहज और संवेदनशील मनुष्य ही आहत होता है।यह दर्द इस संग्रह की तमाम लघुकथाओं में महसूस किया जा सकता है।आश्चर्य है 'सृष्टि की सर्वोत्तम रचना(?)कहलाने वाले इंसान से अधिक वफा़दार तो जानवर और पशु-पक्षी हैं।' इस सत्य को हिमांशु जी ने पूरी व्यंग्यात्मक तल्खी के साथ उभारा है।रचनाकार एक सफल व्यंग्यकार भी हैं;जिसकी झलक चट्टे-बट्टे ,मुखौटा,व्यवस्था ,उपचार ,प्रवेश-निषेध ,काग-भगौड़ा,खलनायक,नयी सीख,प्रदूषण ,अर्थ-परिवर्तन आदि लघुकथाओं में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है।
समग्रतः लघुकथा साहित्य में यह संग्रह अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।इस संग्रह की अनेक लघुकथाओं का पंजाबी गुजराती उर्दू में अनुवाद भी हो चुका है।इस संग्रह में प्रकाशित होने से पूर्व ये लघुकथाएँ विभिन्न पत्र -पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।बुनावट की सहजता भाव एवं विचार का सही सन्तुलन ,अनुभव की सार्वजनीनता एवं ईमानदार दायित्वबोध इस संग्रह की विशेषता है।सुन्दर प्रकाशन एवं मनभावन आवरण के लिए अयन प्रकाशन नई दिल्ली एवं चित्रकार हरि प्रकाश त्यागी बधाई के पात्र हैं।
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असभ्यनगर(लघुकथा-संग्रह)लेखक--रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु'
अयन प्रकाशन 1/20 ,महरौली , नई दिल्ली -110030 ; पृष्ठ 80 ; मूल्यः50 रुपए
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समीक्षा
पुस्तक समीक्षा - तुर्रम (बाल उपन्यास) तथा दिवास्वप्न (शिक्षण कला) - सुधा अवस्थीतुर्रम (बाल उपन्यास) : लेखक - कमलेश भट्‌ट ‘कमल' प्रकाशक : आत्मा राम एण्ड संस नई दिल्ली प्रथम संस्करण:2006 , मूल्य: 80 रुपए (सजिल्द) पृष्ठ संख्या:47प्रस्तुत लघु उपन्यास तुर्रम में श्री कमलेश भट्‌ट ‘कमल' ने बाल सुलभ मन के चित्र बहुत सहजता से उकेरे हैं। पढ़ते समय ऐसा लगा कि मेरा बचपन पुन: लौट आया है।बच्चे वास्तव में मन के सच्चे होते हैं। वे जिसे प्यार करते हैं पूरे मन से प्यार करते हैं। इस उपन्यास का मुख्य पात्र विनीत , तुर्रम नाम के मेंढक से बेहद प्यार करने लगता है। लेखक ने इसका सजीव चित्रण किया है कि बच्चा किस तरह धीरे धीरे तुर्रम से अपने को जोड़ता है। वह जब तक उसके क्रिया कलाप देख नहीं लेता तब तक उसे सुकून नहीं आता। लेखक ने बच्चे के लगाव एवं तुर्रम की हर गतिविधि का सूक्ष्म चित्रण किया है।हर जीव को पालने के पीछे कुछ फायदे भी होते हैं। जैसे मेंढक मच्छर, कीड़े ,मकौडों को खा जाता है। इस प्रकार मच्छर वातावरण को कीड़े- मकौड़ों से रहित बनाता है। लेखक ने बहुत बारीकी से मेंढ़क की गतिविधियों का अवलोकन किया होगा तभी चित्रण में इतनी सहजता आ सकी है। इस उपन्यास को पढ़कर सबसे पहला विचार यही उभरता है कि हमें जीव -जन्तुओं से प्यार करना चाहिए। जीव -जन्तु किस प्रकार अपने आप को सुरक्षित रखकर स्वतंत्र जीवन जीते हैं। जीव- जन्तु किसी प्रतिबन्ध में रहना पसन्द नहीं करते। घर आने वाले प्रत्येक मेहमान को भी तुर्रम से परिचित कराया जाता है।लेखक ने अन्त में भी बड़ा सुन्दर चित्रण किया है कि जीव -जन्तु भी अपने साथियों के साथ रहना पसन्द करते हैं न कि किसी प्रतिबन्ध में रहना।साज- सज्जा की दृष्टि से यह बाल उपन्यास उत्तम है। मूल्य अधिक है कुछ कम होता तो अच्छा होता। दिवा स्वप्न : गिजू भाई बधेका ( हिन्दी में प्रथम संस्करण, मूल गुजराती में 1932 )हिन्दी अनुवाद : काशिनाथ त्रिवेदीप्रकाशक : नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडियामूल्य: 25 रुपए, पृष्ठ संख्या: 86यह पुस्तक चार खण्डों में विभाजित है:-1 .प्रयोग का प्रारम्भ 2 .प्रयोग की प्रगति 3 .छह महीने के अन्त में 4 .अन्तिम सम्मेलन। लेखक ने लगभग 75 साल पहले जिस शिक्षण- कला के बारे में अपना चिन्तन एक शिक्षक की संघर्ष कथा के रूप में प्रस्तुत किया था. वह आज के शिक्षण की अनिवार्यता हो गई है। अध्यापक की उदासीन मानसिकता को बच्चे किस प्रकार सहन किया करते थे उसे लेखक ने महसूस किया है एवं उसका व्यावहारिक समाधान प्रस्तुत किया है। लेखक परम्परागत शिक्षण के ढाँचे के पक्ष में नहीं है। वह उसमें आमूल -चूल परिवर्तन का हामी है। वह अनेक प्रयोग करता है। किस प्रकार खेल- खेल में शिक्षा दी जाए, कैसे कहानी के माध्यम से बच्चों के लेखन, श्रवण, वाचन आदि क्रिया- कलाप का विकास हो तथा बच्चों को पाठ्‌यक्रम के अलावा अन्य शिक्षण में निपुण किया जाए, कैसे उनकी उत्सुकता का निराकरण किया जाए।अध्यापक लक्ष्मीशंकर ने बहुत ही साहस का कार्य किया;जबकि उस समय उनके साथी उनकी शिक्षण- कला का मज़ाक उड़ाया करते थे कि बच्चों को खेल खिलाकर कहानी सुनाकर बरबाद कर रहे हैं।इस सोच के पीछे उस समय ऐसी ही धारणा थी क्योंकि उस समय परम्परागत शिक्षण से हटकर नवीन विधि को लागू करने का जोखिम मोल लेने में असफल हो जाने का डर भी था। बच्चों को केवल डण्डे के बल पर पढ़ाया जा सकता है, यह गलत धारणा बनी हुई थी। ऐसे में लक्ष्मीशंकर का स्थान-स्थान पर अध्यापक साथियों ने खूब मज़ाक उड़ाया, लेकिन वे विचलित नहीं हुए। परिणाम उसी समय दिखाई देने लगे थे । डायरेक्टर साहब ने लक्ष्मीशंकर जी को खूब सहयोग दिया।शिक्षक ने प्रत्येक विषय को क्रियाकलाप के माध्यम से पढ़ाया। मनोवैज्ञानिक ढंग से अध्ययन एवं विश्लेषण करके पता लगाया कि किस विद्यार्थी की किस कार्य में रुचि है। छात्र को केन्द्र में रखकर परीक्षा में आमूल चूल परिवर्तन किये। लेखक का मानना है कि कुछ बच्चों को पुरस्कृत करके कुण्ठा एवं अभिमान की भावना का ही प्रसार होता है। गिजू भाई की सुझाई गई नई प्रणाली आशाओं से भरे मधुर सपनों को साकार करती है। यह पुस्तक शिक्षक वर्ग के लिए एक उत्प्रेरक का काम करती है और नई से नई पद्वति के अपनाने पर बल देती है।**-**

बाल -जगत



लोरी   -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
छोटी-छोटी बकरी

छोटी छोटी गैया ।
गैया चराए मेरे
छोटे कन्हैया ।
छोटे-छोटे हाथ

छोटे-छोटे पाँव ;
ठुमक- ठुमक जाएँ
गोरी के गाँव ।
आँखों में दिखता
है आसमान ।
पतले से होठों पर
छाई मुस्कान ।
किलक-किलक में
सारे गुणगान ;
तुतली-सी बोली में
छिपे भगवान ।


2-आ भाई सूरज
आ भाई सूरज-
उतर धरा पर
ले आ गाड़ी
भरकर धूप ।
आ भाई सूरज-
बैठ बगल में
तापें हाथ
दमके रूप ।
आ भाई सूरज-
कोहरा अकड़े
तन को जकड़े
थके अलाव ।
आ भाई सूरज
चुपके-चुपके
छोड़ लिहाफ़
अपने गाँव ।
……………………………………………
8 जनवरी2007
…………………………………
तुम मुस्काओ तो सूरज खिल जाएगा ।
ढलते सूरज को भी रूप मिल जाएगा ॥

दोहे-व्यंग्य(SATIRE)


व्यंग्य दोहे-रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
नंगों की इस भीड़ में ,नहीं शर्म का काम ।
इतने नंगे हो गए , नंगा हुआ हमाम ॥ 1॥
मन में कपट कटार है , मुख पर है मुस्कान ।
गली-गली में डोलते , ऐसे ही इंसान ॥ 2॥
नफ़रत सींची रात -दिन ,खेला नंगा खेल ।
आग लगाकर डालते ,खुद ही उस पर तेल ॥3॥
जनता का जीना हुआ ,दो पल भी दुश्वार ।
गर्दन उनके हाथ में जिनके हाथ कटार ॥4॥
ऊँची-ऊँची कुर्सियां , लिपटे काले नाग ।
डँसने पर बचना नहीं , भाग सके तो भाग ॥5॥
रात अंधेरी घिर गई , मुश्किल इसकी भोर ।
भाग्य विधाता बन गए , डाकू ,लम्पट ,चोर ॥6॥
गुण्डों के बल पर चला , राजनीति का खेल ।
भले आदमी रो रहे ,ऐसी पड़ी नकेल ॥7॥
बनी द्रौपदी चीखती ,अपनी जनता आज ।
दौर दुश्शासन का चला ,कौन बचाए लाज ॥8॥

लघुकथा(VERY SHORT STORY)

लघुकथा
 ­एजेण्डा  रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु

"आप इस देश की नींव हैं। नींव मज़बूत होगी तो भवन मज़बूत होगा । भवन की कई कई मंजिलें मज़बूती से टिकी रहेंगी-" पहले अफ़सर ने रूमाल फेरकर जबड़ों से निकला थूक पोंछा। सबने अपने कंधों की तरफ़ गर्व से देखा, कई कई मंज़िलों के बोझ से दबे कंधों की तरफ़ ।
अब दूसरा अफ़सर खड़ा हुआ, "आप हमारे समाज की रीढ़ है। रीढ़ मज़बूत नहीं होगी तो समाज धराशायी हो जाएगा।" सबने तुरंत अपनी अपनी रीढ़ टटोली। रीढ़ नदारद थी। गर्व से उनके चेहरे तन गए - समाज की सेवा करते करते उनकी रीढ़ की हड्डी ही घिस गईं। स्टेज पर बैठे अफ़सरों की तरफ़ ध्यान गया सब झुककर बैठे हुए थे। लगता है उनकी भी रीढ़ घिस गई है।
"उपस्थित बुद्धिजीवी वर्ग"- तीसरे बड़े अफ़सर ने कुछ सोचते हुए कहा, "हाँ, तो मैं क्या कह रहा था ," उसने कनपटी पर हाथ फेरा, , "आप समाज के पीड़ित वर्ग पर विशेष ध्यान दीजिए।"
पंडाल में सन्नाटा छा गया। बुद्धिजीवी वर्ग ! यह कौन सा वर्ग है ? सब सोच में पड़ गए। दिमाग़ पर ज़ोर दिया। कुछ याद नहीं आया। सिर हवा भरे गुब्बारे जैसा लगा। इसमें तो कुछ भी नहीं बचा। उन्होंने गर्व से एक दूसरे की ओर देखा ­ समाज हित में योजनाएँ बनाते बनाते सारी बुद्धि खर्च हो भी गई तो क्या ।
अफ़सर बारी बारी से कुछ न कुछ बोलते जा रहे थे। लगता था ­ सब लोग बड़े ध्यान से सुन रहे हैं। घंटों बैठे रहने पर भी न किसी को प्यास लगी, न चाय की ज़रूरत महसूस हुई ,न किसी प्रकार की हाज़त।
बैठक ख़त्म हो गई। सब एक दूसरे से पूछ रहे थे ­ "आज की बैठक का एजेंडा क्या था? "
भोजन का समय हो गया। साहब ने पंडाल की तरफ़ उँगली से चारों दिशाओं में इशारा किया। चार लोग उठकर पास आ गए। फिर हाथ से इशारा किया , पाँचवाँ दौड़ता हुआ पास में आया ­ 'सर'
"इस भीड़ को भोजन के लिए हाल में हाँक कर लेते जाओ।, इधर कोई न आ पाए।" साहब ने तनकर खड़ा होने की व्यर्थ कोशिश की।
पाँचवाँ भीड़ को लेकर हाल की तरफ़ चला गया।
"तुम लोग हमारे साथ चलो।" साहब ने आदेश दिया।
चारों लोग अफ़सरों के पीछे पीछे सुसज्जित हाल में चले गए।
चारों का ध्यान सैंटर वाले सोफे की तरफ़ गया, ।वहाँ चीफ़ साहब बैठे साफ्ट ड्रिंक पी रहे थे। साहब ने चीफ़ साहब से उनका परिचय कराया, " ये बहुत काम के आदमी हैं। बाढ़, सूखा, भूकंप आदि जब भी कोई त्रासदी आती है ;ये बहुत काम आते हैं।"
चीफ़ साहब के चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।
"चलिए भोजन कर लीजिए।" उन्होंने चीफ़ साहब से कहा ­ "हर प्रकार के नानवेज का इंतज़ाम है।"
"नानसेंस"­ चीफ़ साहब गुर्राए, "मैं परहेज़ी खाना लेता हूँ । किसी ने बताया नहीं आपको ?"" सारी सर" -छोटा अफ़सर मिनमिनाया­ "उसका भी इंतज़ाम है, सर ! आप सामने वाले रूम में चलिए।"
वहाँ पहुँचकर चारों को साहब ने इशारे से बुलाया। धीरे से बोले, निकालो।"धीरे से चारों ने बड़े नोटों की एक एक गड्डी साहब को दे दी। साहब ने एक गड्डी अपनी जेब में रख ली तथा बाकी तीनों चीफ़ साहब की जेबों में धकेल दीं।
चीफ़ साहब इस सबसे निर्विकार साफ्ट ड्रिंक की चुश्कियाँ लेते रहे , फिर बोले, "जाने से पहले इन्हें अगली बैठक के एजेंडे के बारे में बता दीजिएगा।"


हाइकु(HINDI HAIKU)

     हाइकु
           1-
         दाएँ न बाएँ
          खड़े हैं अजगर
          किधर जाएँ ।
           2-
         मौत है आई
जीना सिखलाने को
देंगे बधाई ।
3-
मैं नहीं हारा
है साथ न सूरज
चाँद न तारा ।
4-
साँझ की बेला
पंछी ॠचा सुनाते
मैं हूँ अकेला ।
5-
सर्दी की धूप
उतरी आँगन में
     ले शिशु रूप
       6-
खुशबू- भरी
हर पगडण्डी सी
नन्हीं दुनिया
7-
अँजुरी भर
आशीष तुम्हें दे दूँ
आज के दिन ।
8-
फैली चाँदनी
धरा से नभ तक
जैसे चादर ।
9-
काँपती देह
अभिशाप बुढापा
टूटता नेह ।
10-
जनता भेड़ें
जनसेवक भेड़िए
ख़ड़े बाट में ।
11-
काला कम्बल
ओढ़ नाचती देखो
पागल कुर्सी ।
12-
बरस बीते
आँसुओं के गागर
कभी न रीते ।
13-
बसंत आया
धरा का रोम-रोम
जैसे मुस्काया ।
14-
चुप बाँसुरी
स्वर संज्ञाहीन से
गीत आसुरी ।
15-
व्याकुल गाँव
व्याकुल होरी के हैं
घायल पाँव ।
16-
कर्ज़ का भार
उजड़े हुए खेत
सेठ की मार ।
17-
बेटी मुस्काई
बहू बन पहुँची
लाश ही पाई ।
…………