Wednesday, October 17, 2007

कुछ कीजिए

कुछ कीजिए
ईमान हुआ बेघर, कुछ कीजिए ।
भटकता है दर–बदर ,कुछ कीजिए ।
फ़रेब के सैलाब से न बच सके
परेशान है रहबर ,कुछ कीजिए ।
रहनुमा बनकर जो कल गले मिले।
वे लिये आज ख़ज़र,कुछ कीजिए ।
बेहया हो गया मौसम बहार का ।
मुश्किल है बहुत सफ़र,कुछ कीजिए ।
ख़ुदा! तू भी परेशान ही होगा
तेरा ख़ौफ़ बेअसर ,कुछ कीजिए ।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’