Friday, October 12, 2007

अरबी-फ़ारसी और उर्दू की लघुकथाएँ

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’लघुकथा ने अनेक अन्तर्विरोधों और उपेक्षाओं से जूझते हुए अपना मार्ग तय किया है। धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चों पर अविभाजित होकर कैसे संघर्ष करें, मानवता के मार्ग में अवरोध बनने वाली विषम परिस्थितियों को कैसे बदला जाए; इन सबका उत्तर लघुकथा देती है। इस संकलन की विभिन्न लघुकथाएँ देश काल और परिस्थितियों को लाँघकर एक साझा संस्कृति की तलाश में अग्रसर हैं। साम्प्रदायिक एवं भौगोलिक आधार पर प्रकटत: दिखाई देने वाला विभाजन वैचारिक स्तर पर बेमानी सिद्ध हो रहा है।
इस संकलन में 23 रचनाकारों की 167 कथाएँ हैं जिनमें से अधिकतर को लघुकथा की श्रेणी में रखा जा सकता है। ये लघुकथाएँ जहाँ अपनी विकासयात्रा का आभास कराती है। वहीं अपने दायित्वबोध के कारण सभी सीमाओं को तोड़कर प्रासंगिकता से जुड़ी हैं। ये अरबी फारसी और उर्दू की लघुकथाएँ अपने विषयबोध और शिल्प के कारण अनायास ही हिन्दी लघुकथा से अद्भुत साम्य स्थापित किए हुए हैं।
खलील जिब्रान की लघुकथाएँ जीवन का व्यापक अनुभव समेटे हुए हैं। अन्ध विश्वास जड़ता का जनक है। ‘वह पवित्र नगर’ इसी सड़ी गली दम तोड़ती आस्था पर व्यंग्य है। बच्चों के माध्यम से लेखक ने अबोधता को ही निश्छलता और सहज ज्ञान का दृढ़ आधार माना है। ईश्वरीय आदेश महज़ कुछ कुण्ठित दिमागों की उपज़ है। ‘आँसू और हँसी’ में मानवेतर पात्र मगर और लकड़बग्घे के माध्यम से सहज जीवन जीने वालों की पीड़ा का चित्र है। आत्मीय सम्बन्धों में नफरत को भी स्वीकार्य मान लेना सच्चा लगाव है। लेखक ने ‘लगाव’ लघुकथा में इस तथ्य को मनोवैज्ञानिक ढंग से विश्लेषित किया है।दूसरों की पीड़ा में सुख का अनुभव करने वाले, डराने के आनन्द को सर्वोपरि समझकर जीने वाले लोग अपने खोखले और आरोपित व्यक्त्वि को सदा के लिए बरकरार नहीं रख पाते। ‘विजूका’ में इसी खोखलेपन को चुनौती देकर, उसने डराने वालों की दयनीयता प्रकट की है। विजूके के सिर पर घोंसला बनाकर कौए उसे उसके खोखलेपन का आभास करा देते हैं। विश्व में आतंक मचाने वालों की यही परिणति हुई है। ‘ दो बच्चे’ में शोषण पीडि़त समाज का यथार्थ मुखर है तो ‘न्याय का तकाज़ा’ में न्याय की विवेकशून्यता पर तीखा प्रहार है। सुनी सुनाई बातों को पूर्ण सत्य मानने वाले नहीं समझ पाते ​कि वे अनुमान के आधार पर सच्चाई को दफन कर रहे हैं। ‘अनुमान’ इसी भेड़चाल पर व्यंग्य है। ‘मूर्खों का ज्ञान’ में बताया गया है कि विवेक- शून्य लोगों के बीच रहकर कोई निर्णायक भूमिका नहीं निभाई जा सकती। मूर्ख लोग अपनी दुबु‍र्द्धि को ही परम ज्ञान समझ बैठते हैं।
श्रेष्ठ कार्य करने के लिए पीड़ादायक मार्ग से गुजरना पड़ता है।कठोर परिश्रम ही जीवन का सत्य ह॥ निरन्तर चुनौतियों से जूझना ही जीवन्तता है।ख़लील जिब्रान ने ‘प्रसव पीड़ा’ और ‘हीरा और पत्थर’ लघुकथाओं में इस दर्शन की पुष्टि की है। ‘वास्तविक सुख’ दाम्पत्य जीवन की विडम्बना का लेखाजोखा है। इन लघुकथाओं में लेखक का दार्शनिक रूप् अपेक्षाकृत अधिक मुखर है। हर्ष और शोक एक ही सिक्के के दो पहलू है। दोनों ही अनिवार्य सत्य है।‘हर्ष और शोक’ लघुकथा इस तथ्य की पुष्टि करती है। ‘पागलखाना’,शांति और शोर’ ‘लेना–देना’ लघुकथाओं में क्रमश: सहज विकास में बाधा बनने वालों, कथनी–करनी में एकरूपता न रखने वालों तथा थोपे गए उपदेशों को सर्वस्व मानने वालों पर व्यंग्य है।
‘अंतिम संदेश’ आधुनिक राजनीति युद्धप्रियता और क्षेत्रीयता की बुराइयों का उल्लेख करती है।
डॉ0 तहा हुसैन की लघुकथाएँ ‘भाग्य लेख’ और गधा’ ईश्वर की समता मूलक दृष्टि एवं आचरण पर आधारित धर्म की पुष्टि करती है। ‘गोद का बच्चा’ लघुकथा न होकर–केवल व्यंग्य–प्रसंग है। मु0 हलीम अब्दुल्ला ने ‘ध्वनि–प्रतिध्वनि’ वैवाहिक सम्बन्धों का विश्लेषण करती कथा है। यह रचना कहानी के अधिक निकट है।
‘फतूमा’ शिल्प की दृष्टि से सफल लघुकथा है। अब्दुल मलिक नूरी ने 25 वर्षों के घटनाक्रम को एक ही बिन्दु पर केन्द्रित किया है। फतूमा के लिए लड़कियों को जन्म देना अभिशाप बन गया है। आज एशियाई क्षेत्र की हर फतूमा इस अभिशाप से ग्रस्त है। यह चरित्र सभी उपेक्षित नारियों का प्रतिनिधित्व करता है।
नजीब महफूज की लघुकथाएँ–अल्लाह की मर्जी ,इल्जाम, बंदगली कथ्य एवं प्रस्तुति दोनों ही दृष्टियों से साधारण हैं। मो0 तैमूर की लघुकथा ‘रेलगाड़ी’ में उस रुग्ण चिन्तन पर प्रहार है जो लोक कल्याणकारी कार्यों को व्यर्थ समझते हैं। इस रचना में सत्ताधारी वर्ग का समर्थन करने वालों की बदनीयती पर करारा प्रहार हे। समीरा माइने ने प्राच्य और पाश्चात्य संस्कृति के नारी विषयक चिन्तन को ‘वार्तालाप’ लघुकथा में रेखांकित किया है।
शेखसादी की कथाएँ दृष्टान्त, नीतिकथा, प्रेरक प्रसंग के अधिक करीब हैं। फिर भी आज की लघुकथाओं का बीजरूप इन कथाओं में तलाशा जा सकता है। ‘अपनी कमाई’ में श्रम की महत्ता तथा ‘कविता’ में सच्ची कविता के यथार्थपरक होने की पुष्टि की गई है।
फारसी कथाकार मोहसिन मीहन दोस्त की सभी कथाएँ लोककथा शैली में लिखी गई हैं। ये कथाएँ लघुकथाएँ नहीं बन पाई हैं ‘बुद्धिमान’ कथा तो विश्वप्रसिद्ध लोक कथाओं में से एक है।
ए0 जी0 केल्सी की रचना ‘बोझ’ चुटकुला मात्र है। ‘भूख का ईमान’ अच्छी लघुकथा है। भूख का ईमान से कोई सम्बन्ध नहीं होता ।
मंटो की लघुकथाएँ साम्प्रदायिक सोच पर कड़ा प्रहार करती हैं। क्रूरता मनुष्य को राक्षस की श्रेणी में खड़ा कर देती है। बेखबरी का फायदा,घाटे का सौदा, सफाई पसन्द, मुनासिब कार्रवाई लघुकथाएँ अहिंसा की विडम्बना और क्रूरता के विस्तार की पीड़ा सँजोए हैं।
राजिन्दर सिंह वेदी की लघुकथा ‘घटनाएँ’ तथा जोगिन्दर पाल की आगमन ,ताल, मशीन श्रेष्ठ लघुकथाएँ है। डॉ0 इकबाल हसन आजाद की लघुकथा ‘लायकान’ हमारे दैनिक जीवन से धर्म के निष्कासन की पीड़ा सँजोए है। घर में सैक्स की पुस्तकों के लिए जगह है पर पवित्र पुस्तक के लिए एक कोना भी नहीं है। स्थानाभाव के कारण पवित्र पुस्तक मस्जिद में भेज दी जाती है। दूसरी लघुकथा ‘इंकलाब’ में नारेबाजी और हड़ताल की परिणति प्रस्तुत की है।
चाँदनी डा0 जाकिर हुसैन की कहानी है। ‘कुत्ता’ और उल्लू’ इब्ने इंशा के व्यंग्य हैं। लघुकथा नहीं बन सके है।
हाँ, ‘अलग देश’ वार्तालाप शैली में लिखी इनकी एक श्रेष्ठ लघुकथा है। लेखक ने द्विराष्ट्र के सिद्धान्त पर तीखी चोट की है। अलग देश क्यों बनाया गया का उत्तर तीखा एवं मर्मस्पर्शी है–‘गलती हुई। माफ कर दीजिए। अब कभी नहीं बनाएँगे।’
मु0 इलियास ने अपनी लघुकथा ‘कद्र’ में देह व्यापार से ऐशो आराम की जिन्दगी बिताने वालों की मनोवृत्ति बिना नफरत जगाए उद्घाटित किया है। महबूब ,नजर फातमा ,हनीफ बाबा और अफजल अहसन शाद की लघुकथाएँ साधारण हैं।
इस संकलन का कुछ रचनाओं के कमजोर होने से महत्त्व कम नहीं हो जाता। जब तक विभिन्न देशों और भाषाओं की लघुकथाएँ हमारे सामने नहीं होंगी तब तक हम हिन्दी लघुकथाओं का वस्तुपरक मूल्यांकन नहीं कर पाएँगे।यह संकलन एक साझा संस्कृति की तलाश है । इन लघुकथाओं में हम आज के समाज का सच्चा चित्र देख सकते हैं। हिन्दी पाठकों को विश्वस्तर की इतनी लघुकथाएँ सौंपकर सम्पादक द्वय ने जो श्लाध्य प्रयास किया है, उसके लिए हिन्दी लघुकथा जगत निश्चित रूप से आभारी रहेगा।
………………………………………………………………………………………………………………………… वह पवित्र नगर : सम्पादक द्वय सर्वश्री बलराम एवं सुकेश साहनी ;राष्ट्र भाषा प्रकाशन ,518/6बी विश्वास नगर शाहदरा दिल्ली-110032 ;मूल्य 70 रुपए ;पृष्ठ :144 ;संस्करण :1993
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