Friday, June 15, 2007

नहीं मिला


ज्ञानेन्द्र ‘साज़’

ढूँढा किए जिसे वो उमर भर नहीं मिला
चलता रहा मगर तो सफर पर नहीं मिला ।
जब से उधार ले गया वह हमसे माँगकर
चक्कर पे चक्कर काटे पर घर पर नहीं मिला ।
छत पर किसी से बात में मशगूल था इतना
कितना पुकारा नीचे उतर कर नहीं मिला ।
वह मिलना चाहता था अपने समाज से
दहशतज़दा था इस कदर डरकर नहीं मिला ।
महफ़िल में उसकी हम गए फिर भी वो ऐंठ में
बैठा ही रहा हमसे वो उठकर नहीं मिला ।
कैसा अजीब दौर है ऐ दोस्त क्या कहूँ
दिल भी मिलाया था मगर दिलबर नहीं मिला ।
होली हो, ईद हो मगर ये देखिए कमाल
जो भी मिला गले से , वह खुलकर नहीं मिला ।
हुआ जवान तो हिस्से की बात को लेकर
बचपन के जैसा ,भाई भी हँसकर नहीं मिला।
मन्दिर में,मस्ज़िदों में,गिरजों में कहीं भी
ढूँढा तो बहुत था कहीं ईश्वर नहीं मिला ।
कुण्ठित है मगर जी रहे हैं फिर भी शान से
हमको किसी के धड़ के ऊपर सर नहीं मिला ।
रहज़न मिले,लुटेरे मिलें नक़बज़न मिले
ऐ साज़ मेरे देश को रहबर नहीं मिला ।