Saturday, March 3, 2007

हाइकु(HINDI HAIKU)

     हाइकु
           1-
         दाएँ न बाएँ
          खड़े हैं अजगर
          किधर जाएँ ।
           2-
         मौत है आई
जीना सिखलाने को
देंगे बधाई ।
3-
मैं नहीं हारा
है साथ न सूरज
चाँद न तारा ।
4-
साँझ की बेला
पंछी ॠचा सुनाते
मैं हूँ अकेला ।
5-
सर्दी की धूप
उतरी आँगन में
     ले शिशु रूप
       6-
खुशबू- भरी
हर पगडण्डी सी
नन्हीं दुनिया
7-
अँजुरी भर
आशीष तुम्हें दे दूँ
आज के दिन ।
8-
फैली चाँदनी
धरा से नभ तक
जैसे चादर ।
9-
काँपती देह
अभिशाप बुढापा
टूटता नेह ।
10-
जनता भेड़ें
जनसेवक भेड़िए
ख़ड़े बाट में ।
11-
काला कम्बल
ओढ़ नाचती देखो
पागल कुर्सी ।
12-
बरस बीते
आँसुओं के गागर
कभी न रीते ।
13-
बसंत आया
धरा का रोम-रोम
जैसे मुस्काया ।
14-
चुप बाँसुरी
स्वर संज्ञाहीन से
गीत आसुरी ।
15-
व्याकुल गाँव
व्याकुल होरी के हैं
घायल पाँव ।
16-
कर्ज़ का भार
उजड़े हुए खेत
सेठ की मार ।
17-
बेटी मुस्काई
बहू बन पहुँची
लाश ही पाई ।
…………

14 comments:

  1. hindi haiku ki khoj mein aapke duaar pahuncha , bahut achhey lagey aap ke haiku ,

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  2. Achchhe haiku milte hain aapke blog par. Haiku seekhne walon ko aapka blog zaroor dekhna aur padhna chahiye.

    Kunwar Kusumesh
    Blog:kunwarkusumesh.blogspot.com
    Mob:09415518546

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  3. इतने वर्ष पहले लिखे ये हाइकु लगता है जैसे आपने अभी कल ही लिखे हैं। सच कहा जाए तो एक अच्छी रचना वर्षों तक अपनी सार्थकता बनाये रखती है। बहुत - बहुत बधाई !

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  4. साँझ की बेला
    पंछी ॠचा सुनाते
    मैं हूँ अकेला ।---वाह अद्भुत और यह ----
    सर्दी की धूप
    उतरी आँगन में
    ले शिशु रूप.----कमाल का सृजन बधाई रामेश्वर जी .मंजुल भटनागर .

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  5. एक से बढ़कर एक अर्थपूर्ण हाइकु

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  6. बहुत खुबसुरत ........सादर नमस्ते भैया

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  7. इतने सुन्दर हाइकु...सच्ची...आनंद आ गया...| हार्दिक बधाई और आभार, एक बार फिर इसे सांझा करने के लिए...|

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  8. वाह! भैया जी ! कितने भावपूर्ण हाइकु हैं! बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति !

    ~सादर
    अनिता ललित

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  9. सभी हाइकु बहुत सुन्दर हैं. आपका लेखन सदैव प्रभावशाली होता है. ये सभी हाइकु 7 साल पुराने हैं लेकिन बिलकुल नए से लगते हैं. बहुत शुभकामनाएँ!

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  10. हाइकु से आपका रिश्ता बहुत गहरा है जिसका अनुभव शायद देर बाद हुआ। आपने अपने ब्लॉग की नींव हाइकु से रखी और फिर इस विधा को दिल में ही कहीं छुपा रखा। जिसका कारण शायद लोगों को इस विधा की अधिक जानकारी न होना रहा होगा। आज आपने इस विधा को इतना बढ़ावा दिया है कि सभी आपकी कलम को सलाम करते हैं। रब करे ये कलम इस विधा को यूँ ही आगे बढ़ाती रहे।

    हरदीप

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    1. बहन! आपकी यह टिप्पणी मेरे लिए सबसे बड़ी भेंट है; लेकिन इसके साथ सबसे बड़े तीन सच हैं, जिनमे हिन्दी हाइकु से जुड़ना , मार्च 2007 में भावना जी से अल्प परिचय , 2008 में उनका तारों की चूनर की प्रति मिलने पर और प्रगाढ़ हुआ । अगस्त 2010 में हिन्दी हाइकु के कारण आपसे परिचय और 2011 में सुधा जी से भेंट । यह सबसे बड़ा सच है कि हिन्दी हाइकु के बिना इस विधा को वह गति नहीं मिल सकती थी, जो आज मिली है । हम तीनों एक पारिवारिक रूप में जुड़े, यह हाइकु के हित में रहा। इस बहाने आपक तीनों को मेरा हार्दिक नमन!

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  11. मैं नहीं हारा
    है साथ न सूरज
    चाँद न तारा ।

    इस जिजीविषा को नमन भैया।

    व्याकुल गाँव

    व्याकुल होरी के हैं
    घायल पाँव ।

    बेटी मुस्काई
    बहू बन पहुँची
    लाश ही पाई ।

    इस संवेदना को नमन। सभी हाइकु उत्कृष्ट । आप हम सभी की प्रेरणा हैं। आपके सृजन के लिए दिल से दाद और शुभकामनाएँ !

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  12. bhaisab aapki har vidha lubhati hai ...khoobsurat tatha prabhaavshaali haiku ...sadar naman hai aapke bhaavo ko..aap se hamesha hi prerna milti.hai..isi tarah milti rahe.....aabhaar aapka har khoobsurat vidha ke liye.angin pranaam ke saath-

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  13. दाएँ न बाएँ
    खड़े हैं अजगर
    किधर जाएँ ।

    कर्ज़ का भार
    उजड़े हुए खेत
    सेठ की मार ।
    यह है हाइकु लेखन । लय, अभिव्‍यक्ति, संदेश सकारात्‍मकता और जीवन अनुभव । वाह भाई साहब आप के लेखन का नमन । आप को हार्दिक बधाई।

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