Saturday, March 3, 2007

बाल -जगत



लोरी   -रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु
छोटी-छोटी बकरी

छोटी छोटी गैया ।
गैया चराए मेरे
छोटे कन्हैया ।
छोटे-छोटे हाथ

छोटे-छोटे पाँव ;
ठुमक- ठुमक जाएँ
गोरी के गाँव ।
आँखों में दिखता
है आसमान ।
पतले से होठों पर
छाई मुस्कान ।
किलक-किलक में
सारे गुणगान ;
तुतली-सी बोली में
छिपे भगवान ।


2-आ भाई सूरज
आ भाई सूरज-
उतर धरा पर
ले आ गाड़ी
भरकर धूप ।
आ भाई सूरज-
बैठ बगल में
तापें हाथ
दमके रूप ।
आ भाई सूरज-
कोहरा अकड़े
तन को जकड़े
थके अलाव ।
आ भाई सूरज
चुपके-चुपके
छोड़ लिहाफ़
अपने गाँव ।
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8 जनवरी2007
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तुम मुस्काओ तो सूरज खिल जाएगा ।
ढलते सूरज को भी रूप मिल जाएगा ॥

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