Sunday, March 25, 2007

आस न छोड़ो;हरे राम ‘समीप’


हरे राम ‘समीप’

मुश्किल आई है
तो क्या
वह भी जल्दी हट जाएगी
घुप्प अँधेरे कमरे में यूँ
मुश्किल ओढ़े
अवसादों से
घिरे हुए तुम
घबराए-से
क्यों बैठे हो!

ज़रा टटोलो
दीवारों को
उम्मीदों की अँगुलियों के
कोमल ज़िन्दा इन पोरों से
आहिस्ता-आहिस्ता खोजो
हाथों से दीवार न छोड़ो ।

कमरे की इन दीवारों में
कोई खिड़की निश्चित होगी
जिसके बाहर
बाँह पसारे,स्वागत करने
नई रोशनी मिल जाएगी
जुगनू होंगे , दीपक होगा
चाँद –सितारे कुछ तो होंगे
सूरज भी आ ही जाएगा
आस न छोड़ो ।

मुश्किल में तुम
आस न छोड़ो ।
(मैं अयोध्या…संग्रह से साभार)

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