Monday, March 12, 2007

मैं घर लौटा,


बहुत मैं घूमा पर्वत -­पर्वत
नदी घाट पर बहुत नहाया
और पिया तीरथ का पानी
आग नहीं मन की बुझ पाई।
बहुत नवाया मैंने माथा
मंदिर और मजारों पर भी
खोज न पाया अपने मन का चैन जरा भी ।
रेगिस्तानों में चलाकर के
दूर गया मैं सूनेपन तक
आग मिली बस आग मिली थी।
मैं लौटा सब फ़ेंक ­फान्काकर
भगवा चोला और कमंडल
और खोजने की बेचैनी
उन सबको जो नहीं पास थे
पहले मेरे।
मैं घर लौटा।
आकर बैठा था आंगन में
टूटी खटिया पेड नीम का
बिटिया आयी दौदी­ दौदी
दुबकी गोदी में वह आकर
पत्नी आयी सहज भाव से
और छुआ मुझको धीरे से।
बरस पडी जैसे शीतलता
और चांदनी भीनी­ भीनी
मेरे छोटे से आंगन में ।
मैं मूरख था ,
अब तक भटका
बाहर-बाहर।
झाँक न पाया था भीतर मैं
पावन मन्दिर , तीर्थ जहाँ था
और जहाँ थे ऊँचे पर्वत
शीतल ­शीतल ,
और भावना की नदियाँ थीं
कल­कल करती
छल ­छल बहती।
झोंके खुशबू के
भरे हुए थे , बात ­बात में।
जुड़े हुए थे हम सब ऐसे
नाखून जुड़े हो
साथ मांस के
युगों ­युगों से ।


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जरूरी है

जीवन के लिए जरूरी है
थोडी़ - सी छाँव
थोडी़- सी धूप।
थोडी़ - सा प्यार
थोडी़- सा रूप।
जीवन के लिए जरूरी है…
थोडा़ तकरार
थोड़ी मनुहार।
थोड़े -से शूल
अँजुरीभर फूल।
जीवन के लिए जरूरी है…
दो चार आँसू
थोड़ी मुस्कान।
थोड़ी - सा दर्द
थोड़े------- से गान।
जीवन के लिए जरूरी है…
उजली- सी भोर
सतरंगी शाम।
हाथों को काम
तन को आराम।
जीवन के लिए जरूरी है…
आँगन के पार
खुला हो द्वार।
अनाम पदचाप
तनिक इन्तजार।
जीवन के लिए जरूरी है …
निन्दा की धूल
उड़ा रहे मीत।
कभी ­ कभी हार
कभी ­ कभी जीत।

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3 -बहता जल

हम तो बहता जल नदिया का
अपनी यही कहानी बाबा।
ठोकर खाना उठना गिरना
अपनी कथा पुरानी बाबा।
कब भोर हुई कब साँझ हुई
आई कहाँ जवानी बाबा।
तीरथ हो या नदी घाट पर
हम तो केवल पानी बाबा।
जो भी पाया, वही लुटाया
ऐसे औघड, दानी बाबा।
अपने किस्से भूख­ प्यास के
कहीं न राजा रानी बाबा।
घाव पीठ पर , मन पर अनगिन
हमको मिली निशानी बाबा।
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