Sunday, March 11, 2007

कविता


!

बेटियों की मुस्कान 
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’


बेटियों की मुस्कान –
जैसे गूँज उठा
भोर में साम -गान ,
जैसे वन में तिरती
बाँसुरी की तान ,
जैसे भरी दुपहरी में
बरगद की छाया
जैसे लू के बाद
बह उठी शीतल बयार ।
मत छीनो यह मुस्कान
इसके छिन जाने पर -
रूठ जाएँगी ॠचाएँ ,
डूब जाएँगे सातों स्वर ,
रूठ जाएगी शीतल छाया ,
बयार बनेगी
अंगारों की बौछार
झुलस जाएगी सारी सृष्टि ।

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