Sunday, July 27, 2014

अनुभवों का ताप




सुभाष लखेड़ा
  1 - सृजन

जब बर्दाश्त न हुआ
उनसे गरीबों का दर्द
उन्होंने कलम चलाई
कुछ ही देर में
वह कविता बनाई
जो आज कहीं छपी है
वे बहुत खुश हैं
गरीबी की आँच पर
उनकी पहली रोटी पकी है ।
-0-
2-देर से ही सही
   
अचानक आज न जाने क्यों
मैं अपने बारे में सोचने लगा
वर्षों तक मैं अपने को छोड़
शेष लोगों के बारे में सोचता रहा
मुझे सभी में कमियाँ र आती रहीं
मैंने उनके लिए कड़वी बातें कहीं
मुझे उनमें  स्वार्थ नज़र आता था
मुझे उनकी प्रशंसा खलती रही
मैंने उनके बारे में गलत बातें  कहीं
जब मैंने खुद के बारे में सोचना शुरू किया
जान गया मैंने दुनिया को कुछ भी नहीं दिया
अगर कभी कुछ दिया
सिर्फ एक व्यवसायी की तरह दिया
जो दिया उसके बदले कुछ लिया
मैं बातें करने में माहिर होता गया
सच तो यह है कि मैं जो दिखता हूँ
वह सभी कुछ नकली है
मैं अपने स्वार्थ साधता रहा 
मेरा यही रूप असली है
शुक् है कि देर से ही सही
मैं खुद को पहचान गया
खुशी है  मैं आपको न सही
खुद को तो जान गया ।
-0-
2- रेखा रोहतगी
1-विरोध

उसके कंधे से कंधा मिलाकर
मैं चल सकूँ
इसके लिए
उसने हर संभव प्रयास किया
और मुझे चलना सिखाया
पर यह क्या  ?
मैं तो उससे आगे निकल गई
अब- ?
अब उसे यह ज़राभाया
मेरे विरोध में
सबसे पहले वही आगे आया
-0-
2- तुम नही हो तो


तुम नहीं हो तो
मौसम खुला है
और वातावरण शांत है
     न संवाद है
   न परस्पर विवाद है
न कोई अपवाद है
तुम  .............
मिलने की न व्यग्रता है
बिछुने की न आशंका है
प्रतीक्षा भी अब  समाप्त है
तुम................
  न बिंदिया है
न चूडियाँ हैं
न पायल की झंकार का  व्यवधान है
तुम नहीं हो तो
व्यस्तताओं के बीच भी
अवकाश ही अवकाश है
मौसम खुला है
और वातावरण  शांत है
तुम नही हो तो
मन में मेरे न कोई संताप है
तुम्हारी दी गई दृष्टि
तुम्हारे नेह की वृष्टि
तुम्हारी रचित सृष्टि
सभी कुछ तो मेरे साथ है
तुम नही हो तो
तुम्हें  सोचने को
और
तुम्हें  याद करने को
मेरे पास समय पर्याप्त  है
तुम नहीं हो तो
मौसम खुला है
वातावरण शांत है ।
        -0-


3-पुष्पा मेहरा


पिता की स्मृति में

 कल-कल, छल-छल नदिया समान
 था प्यार पिता का,
 थकी न कभी अनुपम, अगाध -
 वात्सल्य-धार- उनके हृदय की
 फूल- बिछौना थी कोमल वह -
 गोद पिता की ।

 बिना-बताए  मन की बातें
 सदा समझने वाले
 अभिलाषाओँ की एक डाल पे
 सौ-सौ फूल खिलाते ।

 मेरे बचपन की  भोली बातें
 अक्सर हँस-हँस मुझे बताते
 माँ के साथ मिल-बैठ कर
 मेरा बचपन  मुझको  याद दिलाते ।

 दुखों के साये से बचाते,
 सुख के मोती रोज़ लुटाते,
 व्यस्त जीवन की धूपा-छाहीं में
 वे सदा मुसकाते रहते 
 जान न पाई मैं -
 पिता की बगिया में जन्मा,
 वह प्यारा मृगछौना बचपन
 कब और कहाँ मुझसे बिछुड़ गया!

 बढ़े कदम, पा लक्ष्य- सुदृढ़
 ले दूरदॄष्टि पिता की
 पथ के बीच सँभल मैं-
 पा गयी लक्ष्य भी ।

 गहन चिंतन, अनुभव - आलोड़न
 से निखरा उनका जीवन -
 त्याग-प्रेम के अनुबंधों का
 प्यारा सा संगम ,
 स्नेह-धार से आप्लावित था
 रिश्तों का पूरा आँगन ।

 बट-वृक्ष समान सघन यादो का साया
 मेरे माथे के श्रम-बिंदु
 आज भी पौंछने को
 आतुर लगता ।

 हे पिता ! तुम्हें देवता कहूँ
 या देवतुल्य कहूँ
 यह अबतक समझ न पाई मैं -
 पर  मन - दर्पण में सम्पूर्ण तुम्हारा-
 झलमल-झलमल जो झलक रहा
 उसकी कांति मुझको
 रह-रह यह अहसास कराती है-
 हे पिता ! तुम देवतुल्य नहीं
 देव-रूप में जन्मे थे ।

 कर्मरथ चढ़े  परसेवा , परोपकार में
 सदा तुम समय का मूल्य चुकाते थे

 तुम्हारी यादों की अक्षुण्ण ज्योति
 मन की देहरी पर
 अब तक रोज़ जलाती हूँ
 मधु-भावों का नैवेद्य सदा
 श्रद्धा से  अर्पित करती हूँ ।
 -0-

 

पथ की प्यास




1-ज्योत्स्ना प्रदीप
1-गहरा दर्द

अँधेरा
नेत्रहीन तो था ही
पर जब कभी गूँगा, बहरा होता है,
रौशनी को दर्द गहरा होता है।
कुरेदती है वो
दिल उसका जब कभी,
मिट जाता है बिन कहे- सुने
जबकि
हौसलों का हर तरफ पहरा होता है।
-0-
2-अपनत्व

रक्त्त बहता है जब चोट से,
कुछ समय बाद वही जम जाता है।
एक कवच बन ,
वही थम जाता है।
एक बूँद भी जानती है
भाव अपनत्व का।
-0-
3-हौसला

देखी तो  होगी
तुमने आँधी,
आँखें बंद कर लेते होंगे।
मगर
उसका हौसला तो देखो
वो अपनी बाज़ुओ में
लेकर चलती है
एक विनाश ही नहीं
एक नव -सृजन भी।
-0-
2- प्यासा पथिक
-डॉ० कविता भट्ट

मीलों के पत्थर गिनते हुए बीते पहर,
आँखें अब तक भी सोनहीं।
एक भी धड़कन ऐसी नहीं जो,
स्मृतियों में तेरी कभी खोनहीं ।
        पलपल गूँथती रही सिसकियाँ आँखें,
        परन्तु पलकें मैंने अभी भिगोनहीं।
        जीवन की कहानी कटु होती गई,
        परन्तु आशा मैंने अभी डुबोनहीं।
प्यासा पथिक बन गहन रातों को,
अँजुरियाँ तुमने कभी सँजोनहीं।
झूठ हैं ये प्रणय की लड़ियाँ सपनीली,
यथार्थ में, तुमने कभी पिरोई  नहीं।
अंकुरण हो न हो, तुम प्रस्फुटन चाहते हो,
कैसे हो ? कतारें तुमने कभी बोनहीं।
-0-
दर्शनशास्त्र विभाग ,हे०न०ब०गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढवाल, उत्तराखण्ड
-0-
3-रेणु कुमारी



  उन मासूम सी आँखों में,
   जाने कितने सपने थे,कितने अपने थे।
वो जो हर बात पर मुस्कुराकर,
शरमा कर लाड दिखाया करती थी।
मेरी प्यार- भरी एक आवाज़ पर,
घबरा कर भाग जाया करती थी।
        वक़्त की उस भागती दौड़ में,
        जाने कहाँ उसकी नादानी खो गयी।
        पलक झपकते ही सब बदला और,
        मेरी गुडिया सयानी हो गयी।
आज उसके मन में नए अरमान
सपने, उम्मीद जग रही है।
सवाँरने में उसकी वो दुनिया मुझे,
अपनी जिंदगी बेगानी लग रही है।
        पलकों पे कुछ आँसू छोड़ जाएगी,
        हर जगह अपनी निशानी छोड़ जाएगी।
        मेरे आँगन को सूना कर बेटी
        मेरे दिल में अपनी कहानी छोड़ जाएगी..........
                -0-
 
( सभी चित्र गूगल से साभार)