Sunday, July 24, 2016

650



1-सूना आशियाना
        -अनिता ललित 
 किस क़दर सूना हो जाता होगा 
उस चिड़िया का आशियाना …  
उड़ जाते होंगे जब 
उसके नन्हें-नन्हें बच्चे ,
अपने छोटे-छोटे पंख पसारकर ,
किसी नई दुनिया की ओर
अपनी नई पहचान बनाने।
शायद तभी
बुनती है वह, एक बार फिर,
एक नया नीड़ !
और नहीं लौटती
उस घर में अपने … 
कि गूँजती रहती हैं उसमें
यादों की मासूम किलकारियाँ
रीता हो जाने के बाद और भी ज़्यादा
बेपनाह, बेहिसाब … 
दिल को चीरती हुई।

और चलता रहता है ...
यही क्रम सिलसिलेवार। 
बनना, बिगड़ना, टूटना, फिर बनना
कि थकती नहीं वह !
टूटती नहीं वह !
सहते-सहते यह दर्द !
काश! सीख पाते हम इंसाँ भी !
इस दर्द के इक क़तरे को भी,  
दिल में उतारने का हुनर । 
सहते-सहते पीने,... 
पीते-पीते गुनगुनाने का फ़न !  
-0-
 2-हार मानो न तुम
          -डा.मधु त्रिवेदी
गूढ़ रहस्य हमें यह पढ़ाने लगी
बात कोई पते की बताने लगी

गलतियों से सभी लोग लो सीख अब
हर कदम पर हमें यह सिखाने लगी

आसमाँ में पंखों को लगा कर उड़े
रोज सपने नये ही दिखाने लगी

प्यार का पाठ सबको पढ़ा रोज ही
हर सुबह शाम हमकों रिझाने लगी

हार मानो न तुम आज समझा रही
वो बना आज बच्चा हँसाने लगी
-0-

 

Thursday, July 21, 2016

649



श्वेता राय के तीन गीत
भोर गीत
किरणें आकर भोर से, छेड़े मधुरित राग है।
मुदित हृदय यह देख के, गाये एक विहाग है।।

छूकर मलयागिरि पवन, खिलते सबके गात हैं।
पुलकित हो कर साथ में, हिलते सब तरू पात हैं।।
सुघर धरा के भाल पर, स्वर्णिम भोर सुहाग है।
मुदित हृदय यह देख के, गा एक विहाग है।।

पंछी के स्वर में बसी, बातें सब मन मीत की।
दूर्वा दल पर शोभती, पावस बूँदें प्रीत की।।
कण कण में बिखरा हुआ, द्रुम दल पुष्प पराग है।
मुदित हृदय यह देख कर, गाएक विहाग है।।

प्राची से जीवन जगे, जाये पश्चिम छोर तक।
प्रेम पथी बन प्रीत को, बिखरा चहुँ ओर तक।।
अलसा मन में भरे, रंगों का नित फ़ाग है।
मुदित हृदय यह देख कर, गा एक विहाग है।।

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2-बरसात, याद और तुम
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रिमझिम पलछिन गिर रही, बाहर ये बरसात है।
नयनो से भी झर रही, रिमझिम दिन औ रात है।।
आकुल मन आहें भरे, व्याकुळ होते प्राण है।
तेरी सुधि बन दामिनी, लेती मेरी जान है।।

पंकिल जीवन बन गया, प्रीत कुमुद की आस में।
चुपके से करुणा हँसे, दुख के इस परिहास में।।
पुरवाई की चोट से, शिथिल पड़ा ये गात है।
यौवन का दिन ढ़ल रहा, लम्बा जीवन रात है।।

आँसू बन भाषा गअधर चढ़ा इक मौन है।
जग में अब लगता नही, मेरा अपना कौन है।।
आ जाओ प्रिय आज तुम, पा जाऊँ मुस्कान मैं।
जीवन कुसुमित बाग़ की, बन जाऊँ पहचान मैं।।

घुल जायें स्वर कोकिला, धड़कन की हर बात में।
हरियाली दिन सब लगे, झूमे चंदा रात में।।
मन मयूर बन बावरा, खुशियाँ बाँधें पाँव में।
बीते जीवन प्रेम में, प्रीत भरी मधु छाँव में।।

आ जा रे साजना, सावन की बरसात में
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3-मेरी हो पहचान तुम

खिलते हिय के बाग़ में, सुमनों की मुस्कान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

सूना मन का था सदन, आये तुम मधु चाप से।
प्रेम पुजारी बने प्रिये, स्वप्न सजे दृग आप से।।
पूजा थाली थाम लिये, बन जग से अनजान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

मन के मरूथल में बही, प्रीत भरी रसधार है।
पतझड़ बीता, बाग़ अब, भ्रमरों से गुंजार है।।
साँसो से बँध बन गए, जीवन के अब मान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

हाथों में ले हाथ प्रिये, भूली सारे भार को।
अब कब चाहूँ गूँथना, पीड़ा आँसू हार को।।
डूबती जीवन नदी मैं, तिनका सम जलयान तुम।
सपन सलोने प्रिय सुनो, मेरी हो पहचान तुम।।

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श्वेता राय, विज्ञान अध्यापिका,पूर्व माध्यमिक विद्यालय
परसिया भंडारी,देवरिया,उत्तर प्रदेश
मोब 9044375683

Sunday, July 17, 2016

648




1-  पिता-अनिता ललित

माँ के माथे का हैं सूरज, बच्चों की मुस्कान पिता ,
घर भर की खुशियों की ख़ातिर, हो जाते क़ुर्बान पिता।
सर्दी-गर्मी-बारिश सहते, करते ना आराम कभी ,
सब की ख़्वाहिश पूरी करते, खटते सुबहो-शाम पिता।
रौबीली आवाज़ सुनाती, कठिन तपस्या के क़िस्से ,
भीतर से निर्मल, कोमल-मन, दिखने में चट्टान पिता।
सुर्ख़-उनींदी आँखें खोलें, राज़ अधजगी रातों का ,
बच्चों को परवान चढ़ाते, खो देते पहचान पिता।
शाम ढले जब वापस आते, घर में रौनक छा जाती ,
दीवारें भी हँस पड़ती हैं, घर की ऐसी शान पिता।
अनुशासन का पाठ पढ़ाते, मुस्काना भी भूल गए ,
पथरीली राहों पर चलते, हर सुख से अंजान पिता।
घर पर आँच न आने देते, दुनिया से लड़ जाते हैं ,
माँ के मन-मंदिर में बसते, हैं ऐसे भगवान पिता।
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2-गीत-अनिता मंडा
आधार= सार छंद 16+12=28(अन्त में 2 गुरु)
तुम ही सूरज तुम ही चंदा, तुम ही जीवन मेरा।
पाकर तुम को पाया मैंने, फिर से नया सवेरा।

बनकर ख़ुशबू तुम्हीं समाए, उपवन के फूलों में।
तुम्हीं प्रेम की पींगें बनते, सावन के झूलों में।
प्रेम सुधा का सावन बरसे, भीगे तन-मन मेरा
पाकर तुमको पाया मैंने, फिर से नया सवेरा।

नभ पर चाँद सितारे लिखते नित ही प्रेम कथाएँ
पाया उर ने परस प्रेम का, सारी मिटीं व्यथाएँ।
आशाओं ने पथ दिखलाया, निर्भय अब मन मेरा।
पाकर तुमको पाया मैंने, फिर से नया सवेरा।

उड़े भोर में जो थे पंछी, साँझ ले घर आ
मन का बंधन मन ही जाने, कब खुले बंध जा
प्रेम तुम्हारा बना साधना, लूटे कौन लुटेरा।
पाकर तुमको पाया मैंने, फिर से नया सवेरा।

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3-परंपरा-कृष्णा वर्मा

सच में बड़े हो रहे हो तुम
मन मुताबिक चुनने जो लगे हो अब
अपने कपड़े और जूते
हाँ फ़ीते भी तो बाँधना सीख गए हो
बातों को साधना ही नहीं अब
घुमा-फिरा कर इच्छाओं को
व्यक्त करना भी सीख गए हो
अच्छी कोशिश कर लेते हो
बिना रोए रूठे अब तो
मनुहार कर
अपनी बात मनवाने की
मेरी बात-बात पर
प्रश्न-चिह्न और
मेरे सवालों पर
तुरन्त सूझने लगे हैं अब तुम्हें उत्तर
तुम्हारी बढ़ती ऊर्जा ने
फिर इक बार बदल दी है
मेरे विचारों की सतह
धैर्य पर और भी मजबूत
होती जा रही है
तुम्हारी आजी की पकड़
पहले से कहीं अधिक
चटक हो चले हैं
मेरे सपनों के रंग
और प्रेम घट में भी
कुछ ज़्यादा ही
भरने लगी है मिठास
तुम क्या जानो
तुम्हारी आँखों में टँकी
जिज्ञासा ने
कैसे बढ़ा दी है मेरी
कहानियाँ कविताएँ गढ़ने की क्षमता
सच कहूँ तो
पल-पल तुम याद दिलाते हो
मुझे
अपने पिता का बाल्यकाल।
 
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4-डॉ सिम्मी भाटिया
1-संवेदनाओ से परे



राख के ढेर में
ढूँढ़ती
सूनी आँखें
कुछ अवशेष
पैरो तले पगड़ी
कर्ज़ में डूबा
विचलित मन
माँगे रह गयी अधूरी
मुट्ठी भर दाने
न निगले गए
निगल गया
दहेज़ दानव
हाँहुँच गया मानव
चाह भौतिक सुख की
संवेदनाओ से परे
टूटते
सपने -आशाएँ
तिस्कृत भावनाएँ
रह जाते अवशेष....
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2-प्रतिबिंब- डॉ सिम्मी भाटिया

ऐसा हो प्रतिबिंब
सृदृढ़ निराला
न हो काली छाया
राग द्वेष से परे
झलके प्यार
और उद्गार विचार
हो ऐसी सौगात
निर्मल सहज
मर्यादित भावनाएँ
ज्ज्ववल पारदर्शी
किरदार
असत्य से ओझल
रेशमी रिश्ते
कुसंगत से परे
मृदु शीतल अभिव्यक्ति
मनमोहक व्यवहार
महकता व्यक्तित्व
धूल छँटे आईना
ऐसा हो प्रतिबिम्ब
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