Saturday, October 1, 2016

676



आस्था झा

खौलती है जब रूह
अपनी परछाई पाने को
कितना छटपटाती होगी
तमाम बारीकियाँ समेटे
खुश्क कर जाती है
जो नम थी कभी
वो ओस की बूँदें
हरी घास पर
नंगे पैर
चले तो होगे ना?
इसी नमी को
बरकरार रखने
मेरी रूह गुनगुनाती है अब
प्यार का कोई सुहाना
गीत गाती है अब
वन्दना परगिहा
कि अब जब मिट्टी में
रखोगे अपने पाँव
तो याद करना मेरा स्पर्श
मिट्टी में घुला हुआ
वो एक और
नम स्पर्श
और तुम भी
गुनगुना देना
मीठा -सा
कोई गीत
-0-Email- www.asthajhamaya@gmail.com

Thursday, September 29, 2016

675



1-सुनीता काम्बोज

काँटेदार झाड़ियाँ फैली, बहुत घना जग कानन है
तमस भरा है रोम- रोम में, ऐसा मन का आँगन है
ईर्ष्या के पत्ते डाली हैं,अहंकार के तरुवर हैं
काई द्वेष की जमी है इसमें, बगुलों से भरे सरोवर
काँटे झूमते निंदा रूपी,घास फूस है जड़ता का
सर्प रेंगते बिच्छू खेलें , बंजर सारे गिरवर हैं
जहरीली बेले फैली हैं, न तुलसी न चंदन है
तमस--
लिप्सा के हैं मोर नाचते, तृष्णा के खग बोल रहे
करुणा, प्रेम दया, ममता भी , सहमे- सहमे डोल रहे
मुक्त करूँ कैसे मैं इनको, नवयुग का निर्माण करूँ
छल की हाला को घन काले ,सच्चाई में घोल रहे
मद के पतझड़ की छाया है ,हीं वसन्त ,न सावन है
तमस----
जल जाएँगे इक पल में ही, सच की आग लगा देना
फूल खिलाकर करुणा के तुम, गुलशन यह महका देना
पुष्प प्रेम के मुरझाए हैं ,फिर से उन्हें खिलाकर तुम
नेह-नीर से इन्हें खींचकर, उजियारा फैला देना
क्यों बिन कारण ये उलझन है ,क्यों संशय की अनबन है
तमस----
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2-परमजीत कौर 'रीत

रोज उम्मीदों की चादर -सी बिछाती है निशा
सबको सपनों के लिये जीना सिखाती है निशा
चाँद आए ,या न आए, है ये उसकी मरजी
र्घ्य देने का धरम अपना , निभाती है निशा
घोर अँधियारे से तन्हा जूझकर भी ,हर सुबह
सोने जैसा नित नया सूरज , उगाती है निशा
रोज मरकर, रोज जीना किसको कहते हैं ,ये
हर प्रभाती को गले मिल मिल बताती है निशा
छोटी छोटी खुशियों से, जीवन सजा लेना 'रीत'
छोटे -छोटे तारों से ज्यों नभ सजाती है' निशा
-0-श्री गंगानगर(राजस्थान)


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Wednesday, September 28, 2016

674



शहीदे आज़म भगत सिंह
गीत
डॉ.पूर्णिमा राय
भारत ये मेरा महान हो जाए ।
खुशहाल हमारा किसान हो जाए ।।
दे दो जन्म-दिवस पर यही तोहफा;
हर युवक भगत- सा जवान हो जाए ।।
पहने सभी आज बासंती चोला;
वीरों पर सबको गुमान हो जाए ।।
देश-प्रेम का सरूर चढ़े इस कदर ;
दिल में भगत का अरमान हो जाए ।।
वीर तेज़ से भरी दिखती 'पूर्णिमा'
कण-कण भगत सिंह निशान हो जाए ।।
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दोहे- डॉ.पूर्णिमा राय

भारत माता के लिये, सहते थे जो पीर।
भगत सिंह से अब कहाँ,जग में दिखते वीर।।
विश्व मनुज से ही बनी, भारत माँ की शान।
भगत सिंह की सोच का, जग में हो सम्मान।।
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