Tuesday, February 9, 2016

615

1-अहसास-
सिम्मी भाटिया

किसको है
एहसास
कौन है वो
जिसको दिखाऊँ
अपने जख्म
अंदर ही अंदर घुट
गमों को छुपाऊँ
आने ना दूँ आँसू
हौले से मुस्कुराऊँ
दम तोड़ रही
ख्वाहिशें
सांसे रुक ना जाएँ
हो कोई ऐसा
देख
जिसको जी जाऊँ
स्पर्श मात्र से
ऐसे खिल जाऊँ
मंत्र मुग्ध हो जाऊँ
उसकी
मीठी बातों में
उलझी ऐसी
उसके ताने-बानो में
देख सके जो मेरा गम
कह सके जो है मेरे संग
कौन है वो
जिसको दिखाऊँ
अपने जख्म
किसको है
एहसास।

-0-
2-जागो पलाश !
पुष्पा मेहरा 

सोई धरती जागी जब
कुछ यूँ बोली
बहुत सहा आघात शिशिर का
उठूँ, शबनम से मुख अपना धोकर
हिम से लड़ उसको विगलित कर
जीवन को रसमय कर दूँ।
आएँगे ऋतुराज,झाँकेंगीं किरण सखियाँ कोमल
अकेला नव विहान क्या क्या कर लेगा !
मैं भी तो कुछ उसका साज शृंगार करूँ,
सोचा जब ऐसा उसने, जाग उठी चेतना उसमें
निश्चय अटल देख धरा का
उगते सूरज ने उसके मन की बात सुनी
और धरती के रग रग में ऊर्जा भर दी ,
हरसाई धरती- कम्पन,ठिठुरन, भय लाज भुला
वह तो घूँघट खोल हँसी
फैली हरियाली , रोमांचित हुई धरा
मंद मदिर हवा गतिमान हुई
सूनेतरुवर में राग भरा ,
अमराई झूमी कोकिल कूका
ताल तलैया , नदियाँ-झरने
मन की कहने- उमड़ चले ,
बीथिका सजी, हरित पाँवड़े बिछे
बौराए अलि, तितली-दल सारे
बसंतोत्सव मनाने निकल पड़े ।
फूलों ने मधु आसव ढाला
पी पी आसव तितली दल, भौंरे ख़ूब छके ,
फिर भौंरों को जाने क्या सूझा!
कमलों के कोमल आसन पा
वे रात बिताने वहाँ रुके ,
कमलों ने भी उनको मान दिया ।
धीरे से आ किरणें झाँकीं
कमलों के पट पर थाप पड़ी
फिर खोल अधर रक्तिम- कोमल
धीरे से कमल भी हरसाया ,
नदधाराओं में अजब किलोल भरा
थिरक उठीं वे गोल गोल, धीमे धीमे ।
सोये पाखी भी जाग उठे
कलरव से गूँजा नीलम नभ
नाच उठे तितली भौंरे, मानों
हो रहा हो रंगारंग कार्यक्रम ।
कोहरे का था न काम वहाँ ,
संत समाज का ही था मान वहाँ
रंगों का अद्भुत संगम था
पक्षियों का मधुर तराना था।
रोके न रुका मन पाखी भी
उड़ चला देखकर खुला गगन
बागों में महुआ महक उठा
बौरों की कलगी से अमराई सजी
डालों पे कोकिल कूक उठा,
सेमल हँसकर यों बोला -
जागो पलाश! आये ऋतुराज ,
तुम भी आओ ! प्रिय कन्त आज
मिलकर देखेंगे वसंतोत्सव ,
यह दाह विरह का अनल सदृश
रह रह पुकारता तुम्हें आज -
आओ प्रिय ! दोनों मिलकर गायेंगे बसंत राग।
Pushpa .mehra @gmail .com

Thursday, February 4, 2016

614



1-मंजूषा 'मन'
1
जीवन भर तो हम रहे, धारण करके मौन।
मेरे मन की बात फिर, बोलो सुनता कौन।
2
मन ये नाजुक है बड़ा, रखना बहुत सँभाल।
खुशियों से मन खिल गया, पूछ लिया जो हाल।
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2-अनिता मंडा
1.
अनसुलझे ही छोड़कर, पीछे कठिन सवाल।
अर्थ भरी मुस्कान ले, बीत गया ये साल।।
2
हे मातु कमलवासिनी,  देना ये वरदान।
नित चरणों में सिर झुके, दूर रहे अभिमान।।
3
झुलसा रही समाज को, ये दहेज की आग।
भस्म हुए सुख-चैन सब, मानव अब तो जाग।।
4
माता का पूजन करे, माँग-माँग वरदान।
कन्या की हत्या करे, कैसा वह इंसान।।
5
खारा खुद को सोचकर, सागर है मगरूर।
उसको मेरी राय है, देखे अश्रु जरूर।।
6
नदिया ये थक-हारकर, चाहे थोड़ा नेह।
सागर के आगोश में, ढूँढ रही निज गेह।।
7
आसमान को छू लिया, रही डोर के संग।
बंधन टूटा डोर का, पाई न उड़ पतंग।।
8
आसमान को छू लिया, रही संग में डोर।
बंधन टूटा डोर का,चली धरा की ओर।।
9
एक बला की सादगी, दूजे चंचल नैन।
दोनों मिलकर लूटते, कर देते बेचैन।।
10
प्रीत निभाओ साँवरा, सुन लो करुण पुकार।
हाथ थामकर अब करो, भव -सागर से पार।।
11
बरसाती अल्हड़ नदी, सिंधु  धीर गम्भीर।
बहती आई दूर से, लेकर मीठा नीर।।
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Anitamandasid@gmail. com
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बसंत के दोहे- कमल कपूर
1
पीली पगड़ी पहन कर,आये हैं ऋतुराज।
बहुत दिनों तक जगत में,करने को यह राज।।
2
महके महुआ माधवी,चमके चटक पलास।
सुरभि की गगरी ले कर,आ पहुचे मधुमास।।
3
हरी हरी दरियाँ बिछी,वर करें आराम।
फूलों ने आवाज दी,आओ तज बिसराम।।
4
लो कोकिल भी छेड़ता,,कुहू कुहू का राग
पुष्प पलाश दहक रहा,ज्यों जंगल की आग।।
5
बसंत पर्व न पूर्ण हो,बिन पूजा त्योहार।
अर्पण करते हैं तुझे,हम आखर के हार।।
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कमल कपूर,२१४४/९सेक्टर,फरीदाबाद१२१००६,हरियाणा
०९८७३९६७४५५

Tuesday, February 2, 2016

613



बिम्ब
पुष्पा मेहरा

इस जग- दर्पण के
टूटते बिखरते से टुकड़ों -बीच
देखते देखते ही प्रत्यक्ष होते अनेक दृश्य
मेरी आँखों में समा रहे हैं
काँस के फूलों से घिरे( आतंकी ) बादलों के,
कैशमिलान के छोटे बड़े ऊन के गोलों की तरह
अनसुलझे प्रश्न- बटों के,
बहती नदी की रुकने का संकेत देती धारा सी-
सिकुड़ती-सहमती नव यौवनाओं के
होंठों की लुटी- पिटी मुस्कान के, जो
हबश की नदी की हरहराती बाढ़ में
न जाने कबसे डूबती रही है |
फूलों की खुशबू दबा सोई
-अनखिली कलियों की सूखी पंखुरियों के ,
जिन्हें देख मेरे ज़ेहन में ,
एक और भयावह पर सत्य बिम्ब ,समाने लगा है जिसमें
रातों को घेरे रहता है एक निर्मम सन्नाटा कि
हरसिंगार खिलते ही झर जाता है ,
समवेदनाएँ जागने से पहले ही उजाड़ के
क्षत- विक्षत कर फ़ेंकीं जा रहीं है |
शहरों में आवारा कुत्तों का जमघट
भावी संततियों- खातिर पार्कों की क्यारियाँ
उजाड़ रहा है ,
टिटिहरी अंडे सेने की जगह तलाश रही है ,
तिजोरियों में बंद धन धनाढ्यों की नींदे
खरीद चुका है |
पूर्वजों की गाढ़ी कमाई से गढ़े घर
जिनमें कभी आत्मीयता ,प्यार और विश्वास
चन्दन की खुशबू सा बसता था आज
हवाओं के बदलते रुख़ उन्हें शिरोमूल से
ढहाने में लगे हैं |
इन नाना दृश्यों के बीच फँसी मैं राह खोज
एक ऐसा गढ़ रचने की कल्पना में डूबी हूँ ,
जिसकी दीवारों की ईंट ईंट में ,
जिसके आँगन आँगन में एक अखंडित दर्पणहो ,
विश्वास- स्नेह की तरलता हो और हो
अटूट रिश्तों की सघन छाया ,
ना भय हो , ना हिंसा हो ,
ना ही ईर्ष्या द्वेष हो , यदि
दर्पण में कोई बिम्ब हो तो अशक्त काँधों पर
किसी सशक्त के हाथ का हो,
गूँज में कोई गूँज हो तो
बस एक आत्मीयता भरे
मृदु स्पर्शों के छुअन की ध्वनि की ही हो |
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