Saturday, November 29, 2014

मन की बात




ऐसा क्यों?  
 सीमा स्मृति
कल शाम जब टेलीविजन चलाया ही था कि न्यूज़ आई कि फरीदाबाद के होली चाइल्ड स्कूल के एक तेरह साल के बच्चे ने जो आठवीं क्लास में पढ़ता था उसने स्कूल के बाथरूम में पैट्रोल डालकर अपने को आग लगा ली। मन और सोच जैसे सुन्न पड़ गए। ये क्या है? स्कूल में पानी की बोतल में पैट्रोल डाल कर ले गया । कसूर किस का है? माँ, बाप, टीचर, हमारा एजूकेशसिस्टम और समाज !कौन है इस घटना का जिम्मेदार ? प्रश्नों का एक सैलाब हिला गया। हम बच्चों को क्या शिक्षा दे रहे हैं?आसान है एकदूसरे पर दोष मढ़ना ।माँ-बाप आसानी से टीचर को दोषी कह सकते हैं और टीचर के पास एक क्लास में तीस चालीस बच्चे होने का दर्द और हर बच्चे पर वन टू वन ध्यान न दे पाने का कारण । क्या कारण होगा कि एक इतना छोटा बच्चा जिसने अभी जीना भी शुरू नहीं किया, जीवन को खत्म करना चाहता है? कौन- सा दबाव होगा जो उस इस हद तक सोचने को मजबूर करे? हमारे समाज में,हमारी शिक्षा प्रणाली क्या इतनी संकुचित हो चुकी है? क्या हम बच्चों को रोबोट बना रहे हैं? क्या नम्बर की दौड़ में अंधे हम जीवन को ली देने वाले गहरे काले गड्ढे नहीं देख पा रहे हैं?मन बार -बार उस बालमन की स्थिति की कल्पना नहीं कर पा रहा कि उसे खुद को इस प्रकार दर्द देकर उस दबाब से मुक्ति पाना चाहता था। मन का हर तार, पूर्णत: तार-तार हो रहा है। शायद उस बच्चे के मन की बात समझने की बात तो दूर है , किसी ने उसे कभी सुना ही नहीं। वरना इतना छोटा बच्चा  ऐसे सोच नहीं पाता। वो पैंतालीस प्रतिशत जल गया ,परन्तु अब खतरे से बाहर है पर क्या उसका शेष जीवन खिल सकेगा।? शरीर के दाग चाहे मिट जाएँ पर मन की सलवटें कभी क्या खत्म हो पाएँगी?
हम सभी को सोचना है कि कमी कहाँ है ? यह एक बच्चे कि   बात नहीं यह पूरे सिस्टम का दोष है। इस भाग -दौड़ और पागल भौतिकवादी दौड़  में अंधे हम क्या खो रहे हैं? क्या हमारे पास बढ़िया कपड़े हैं, मोबाइल है ,घूमना फिरना, मॉल और पिक्चर सभी कुछ है पाने के चक्कर में हम क्या खो रहे हैं  कभी सोचा। सिर्फ एक बार उस बाल मन के दर्द और दबाव को सोचेगें तो भौतिकता की हर चीज कुरूप नजर आगी।  हमें क्या बदलना है , ताकि इस प्रकार फिर कोई मासूम बचपन यूं ना जले।
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Friday, November 21, 2014

जन्मों का अलगाव



क्षणिकाएँ
ज्योत्स्ना प्रदीप
1-घाव एक शब्द का
    
हमारे अपने ही...
एक शब्द से भी,
घाव दे जाते है।
उन्हे पता भी नहीं ,
वो जन्मों का अलगाव दे जाते है।
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2-  न्त

नागफनी..
काँटों से भरी ...पर सीधी,
उसे छूने से हर कोई कतराता है।
वो छुई -मुई....
हया से सिमटी,
तभी तो ,जो चाहे उसे
यूँ ही छू जाता है।
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3- संवेदना

काँटों में भ़ी है संवेदना
छू न लेना ,
रक्त बहा देंगे।
आता है इन्हें भी ...
तेरा जिस्म भेदना।
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Wednesday, November 19, 2014

चोरी और बेशर्मी

फ़ेसबुक  पर अब कुछ लोग बेशर्मी पर उतर आए है । मेरे संग्रह की लघुकथा , जो लम्बे अर्से से लघुकथा जगत में चर्चित रही है , किन्ही  अनिल गुप्ता जी ने अपनी फ़ेसबुक पर चिपका ली । तारीफ़ भी बटोर ली । भाई गिरीश पंकज जी ने सूचना दी तो मैं दंग रह गया । मेरे संग्रह के अलावा यह  अन्य स्थानों पर भी छपी है । 
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अनिल गुप्ता जी आपने खूब बधाई लूट ली मेरी लघुकथा ;ऊँचाई ' अपनी पोस्ट पर लगाकर । मेरा नाम देने में आपको शर्म आती है , तो बधाई लूटने में भी शर्म कीजिए । यह मेरे संग्रह-असभ्य नगर ( 1998)की प्रथम लघुकथा है । हिन्दी लघुकथा-जगत इससे परिचित है। आप इसको अविलम्ब हटाइए ।
http://laghukatha.com/himanshu-04.htm
ऊपर दी गई हमारी वेब साइट पर यह 2007 से लगी है  और नीचे गद्यकोश में भी शामिल है 

http://gadyakosh.org/gk/%E0%A4%8A%E0%A4%81%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%88_/_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%8B%E0%A4%9C_%E2%80%98%E0%A4%B9%E0%A4%BF%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%82%E0%A4%B6%E0%A5%81%E2%80%99

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अन्तिम वाक्य इन्होंने जोड़कर अपना सन्तरूप दिखा दिया। आप भी देखिए-




15 नवंबर को 10:45 अपराह्न बजे <https://www.facebook.com/anilguptarsd/posts/755139264521519>  · Meerut <https://www.facebook.com/pages/Meerut-India/167646613267572>  ·

पिताजी के अचानक आ धमकने से
पत्नी तमतमा उठी....लगता है, बूढ़े
को पैसों की ज़रूरत आ पड़ीहै,
वर्ना यहाँ कौन आने वाला था... अपने पेट
का गड्ढ़ा भरता नहीं, घरवालों का कहाँ से
भरोगे?”
मैं नज़रें बचाकर दूसरी ओर देखनेलगा।
पिताजी नल पर हाथ-मुँह धोकर सफ़र की थकान दूर कर रहे थे। इस बार मेरा हाथ कुछ ज्यादा ही तंग हो गया। बड़े बेटे का जूता फट चुका है।वह स्कूल जाते वक्त रोज भुनभुनाता है।पत्नी के इलाज के लिए पूरी दवाइयाँ नहीं खरीदी जा सकीं। बाबूजी को भी अभी आना था। घर में बोझिल चुप्पी पसरी हुई थी।खाना खा चुकने पर पिताजी ने मुझे पास बैठने का इशारा किया।मैं शंकित था कि कोई आर्थिक समस्या लेकर आये होंगे....
पिताजी कुर्सी पर उठ कर बैठ गए। एकदम
बेफिक्र...!!!
सुनोकहकर उन्होंने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा। मैं सांस रोक कर उनके मुँह की ओर देखने लगा। रोम-रोम कान बनकर अगला वाक्य सुनने के लिए चौकन्ना था। वे बोले... खेती के काम में घड़ी भर भी फुर्सत नहीं मिलती।इस बखत काम का जोर है।रात की गाड़ी से वापस जाऊँगा। तीन महीने से तुम्हारी कोई चिट्ठी तक नहीं मिली... जब तुम परेशान होते हो, तभी ऐसा करते हो। उन्होंने जेब से सौ-सौ के पचास नोट निकालकर मेरी तरफ बढ़ा दिए, “रख लो। तुम्हारे काम आएंगे। धान की फसल अच्छी हो गई थी। घर में कोई दिक्कत नहीं है तुम बहुत कमजोर लग रहे हो।ढंग से खाया-पिया करो। बहू का भी ध्यान रखो। मैं कुछ नहींबोल पाया। शब्द जैसे मेरे हलक में फंस कर रह गये हों।मैं कुछ कहता इससे पूर्व ही पिताजी ने प्यार से डांटा...ले लो,बहुत बड़े हो गये हो क्या ..?”
नहीं तो।" मैंने हाथ बढ़ाया। पिताजी ने नोट मेरी हथेली पर रख दिए। बरसों पहले पिताजी मुझे स्कूल भेजने के लिए इसी तरह हथेली पर अठन्नी टिका देते थे, पर तब मेरी नज़रें आजकी तरह झुकी नहीं होती थीं। 
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दोस्तों एक बात हमेशा ध्यान रखे... माँ बाप अपने बच्चो पर बोझ हो सकते हैं बच्चे उन पर बोझ कभी नही होते है


 

Thursday, October 30, 2014

पौधा



डॉ ०सुधेश
 
        मैं सड़क के बीच का पौधा
         किस ने लगाया
         किस अभागे समय,
         आने वालों जाने वालों को
         बस देखता हूँ
         जगत भी आवागमन का सिलसिला
         कारों तिपहिया वाहनों ट्रकों
         से निकलते ज़़हर में साँस लेते
          मेरे पत्ते काले पड़ गए हैं
          खिली दो चार कलियों ने
          फूल बनने से किया इंकार
           फिर कहाँ फूलों की हँसी
          कहाँ मादक गन्ध
          मेरी सुरभि का कोष
            लूटा सभ्यता की दौड़ ने
           जैसे दिन दहाड़े लुट गया
           सड़क का आदमी
           सड़क के बीचों बीच ।
मैं अगर खिलता
फैले कार्बन को सोख
क्सीजन लुटाता
पर्यावरण सौन्दर्य में
कुछ वृद्धि करता
पर मैं अभागा
सड़क के बीचोंबीच
केवल मूक दर्शक
बन गया हूँ
जैसे सड़क का आदमी ।
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