Thursday, August 25, 2016

659



1-सुन लो कान्हा बात हमारी- योगेन्द्र नाथ शर्मा अरुण
     
हे नटनागर,कृष्ण,कन्हैया,रास रचैया,गोवर्धन धारी!
हे मन मोहन,राधा के प्रिय,हे मुरलीधर, श्यामविहारी!!
सारे जग के पालक हो तुम, तुम्ही सभी कष्टों के हर्ता,
फिरसे आओ यहाँ प्रभु तुम,सुनलो कान्हा बात हमारी!
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2- ओ कन्हैया !
गिरीश पंकज

पता नहीं किस नंदनवन में ,
भ्रमण कर रहे किसन-कन्हैया।
लेकर के अवतार प्रभु तुम,
आज बचा लो अपनी गैया।।

बढ़ते जाते असुर यहाँ पर,
देवों का हो गया पलायन।
'गीता' को सब भूल गए हैं ,
स्वार्थ का इकतरफा गायन।
कंस रूप धर कर के नाना,
करता मानो ता-ता- थैया।।

मुरली की धुन सुनकर तेरी,
गऊ माता इठलाती थी।
चारा चरती थी जंगल में,
और सुखी हो जाती थी।
आज कहाँ चारा-सानी अब ,
कचरा किस्मत में है भैया।

आ जाओ अब कान्हा मेरे,
'यमुना' का उद्धार करो।
एक नहीं अब कंस हजारों
वध करके उपकार करो।
गोकुल जैसा देश बना दो,
कहती है तुझसे हर मैया।
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3-कुण्डलिया-अनिता ललित

भाई है तेरी शरण, सुन लो आज पुकार
मुझको पार उतारना, कान्हा मैं मँझधार
कान्हा मैं मँझधार, न तुम बिन जग में कोई
छेड़ो ऐसी तान, रहूँ मैं तुझमें खोई
मोर-मुकुट मुख सजे, चपल मुस्कान लुभाई
भूलूँ सुख-दुख सभी, निहारूँ छवि मनभाई !!
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2

जब-जब फैला है तमस, तब-तब किया उजास ।

अपनों का जमघट, मगर; हो इक तुम ही पास॥

हो इक तुम ही पास, न दूजा और सहारा ।

तुम ही हो पतवार, बही जब आँसू-धारा ॥

मन कलुषित की हार, नयन में नेह लबाबब ।

धडकन बनी तरंग, मगन कान्हा में दिल जब !!
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Sunday, August 21, 2016

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1-ज्योत्स्ना प्रदीप

कृष्ण -कंत

अर्जुन की भाँति
अंग हो उठे शिथिल
जीवन के कुरुक्षेत्र में
स्वजनों को
शत्रुओं में बदलते देख
मेरा हृदय
कर उठा रुदन
पर कोई मधुसूदन
नहीं आया
इस मन का रथ लड़खड़ाया
क्या अंतर्मन में मचे
महाभारत का कोई अंत होगा ?
मेरा भी कोई कृष्ण कंत होगा ?
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2-टूटी कुर्सी

वह भी था कभी
यौवन की कोमल अनुभूतियों का
सुखद स्पर्श
पिया था उसनें भी मय
मंद -मंद
सानंद
पर जबसे
कुछ टेढ़ी लकीरें
मुख पर छानें लगीं
कमर झुक -झुक कर
धरती से बतियाने लगी
कुछ अपनें लोगो नें
अपनें समाज से निकाल दिया
घर की किसी कोठरी में
टूटी कुर्सी की तरह
 डाल दिया !
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1-पंचपर्णा - 3 -सन् 2005 ( संपादिका डॉ. शैल रस्तोगी से साभार)
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2-बेटियाँ -गज़ल
डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर

डॉ पूर्णिमा राय
आज खुद की कमी भाँपती बेटियाँ;
आसमाँ की ज़मीं नापती बेटियाँ।।


दुश्मनों को हराकर सदा खेल में;
मुस्कुराहट से' दिल जीतती बेटियाँ।।


बोझ से ना झुकें उनके कन्धे कभी ;
प्रेम माँ-बाप का चाहती बेटियाँ।।


नाम दुर्गा भवानी का' लें मान से;
ईश की वंदना आरती बेटियाँ।।


सेव्य भावों -सजी दिख रही आत्मा ;
कष्ट- विपदा में' सब जागती बेटियाँ।।


भोर की वो किरण ओस की बूँद हैं;
पूर्णिमा रात में ताकती बेटियाँ।।
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Thursday, August 18, 2016

657



गिरीश पंकज
रक्षा का यह बंध है, उज्ज्वल इसकी रीत।
भाई-बहन के नेह का, गूँजे नित संगीत ।

सूत्र नहीं यह रेशमी, भावों का अनुबन्ध।
भाई-बहिन का नेह है, ज्यों मधुरिम मकरंद।

हर बहना रक्षित रहे, राखी का सन्देश ।
हर नारी को नित मिले, भयमुक्त परिवेश।।

निर्मल धागा प्रेम का, है कितना मजबूत।
हर पल लगता बहन को , भैया है इक दूत।

रिश्ते मैले हो रहे, फिर भी है विश्वास।
भाई-बहिन के नेह का, उज्ज्वल है अहसास।
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