Tuesday, May 23, 2017

739

1-बेपनाह मोहब्बत                            
डॉ सुषमा गुप्ता


सुनो न ...
बेइंतहा मोहब्बत है तुमसे
इबादत हो मेरी ...
साँसों का सार ...
जिंदगी का ज़रिया ...
दिलों जाँ हो मेरी ।

सुनो देखो ....
न न ...
इनकार न करना ...
बस यही न ले पाऊँगा मैं ...
और तो तेरे सब नखरे
सिर माथे पर मेरी जाँ....
बस प्यार से रिहाई न
दे पाऊँगा मैं ....

सुनो अब....
बहुत हो चुका तुम्हारा...
यूँ इस कदर
ठुकरा नही सकती हो तुम....
ठीक है तुमको न सही
और कभी थी भी नही ....
पर मैं इस दिल का क्या करूँ ?
मेरा जुनून तुम..
जहान तुम...
ईमान तुम ...
भगवान तुम...

सुनो मत जाओ न ...
अच्छा !!!
फिर सोच लो !!!!
देख लो !!!
आखिरी दफ़ा पूछ रहा हूँ !!!
तो नही मानोगी????
ठीक है .....
लो फिर .....
और .....
और अब .....
धुआँ ही धुआँ है
फिज़ाओं में ......
बेपनाह मोहब्बत का
और हर तरफ एक शोर
...............................
तेज़ाब....................
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2- कल रात
सुषमा धीरज

कल रात बहुत देर ढूँढती रही
सुना है जाने वाले तारा बन जाते है
कभी किसी .....और कभी किसी ....
तारे को तकती रही ...
कि तू आ जाए नज़र
किसी में शायद.....
एक अरसे से तुझको नही देखा ...
दिल चीखता है..
झिंझोड़ता है मुझको ...
करता है प्रहार मुझ पर
जाने कितने लगातार ....
बिलखता है बच्चों- सा
कहीं से बस ढूँढ लाऊँ तुझको ....
सब तर्क सब ज्ञान
व्यर्थ लगता है ....
और आ खड़ी होती हूँ
नीले आसमाँ के नीचे मैं भी ।
हाथ में लिए अपनी
कुछ व्यर्थ सी उपलब्धियाँ ....
क्यों कि जो तू नही तो कुछ नही ...
सच कुछ भी नही ....
सब बेमानी है...
यूँ तो दस्तूर निभाने को
हँस भी ली....
मुबारकबाद भी बटोर लाई ....
और ला के पटक दी यूँ ही
घर के एक कोने में
ये नाम की खुशियाँ .....
और आज फिर चुपके से
खोल ली है तेरी तस्वीर .....
देने को तो हौंसला भी
दे ही देती हूँ उनको
जो जन्मदाता हैं हमारे.....
पर मेरी फितरत नही जाती
लड़ने की तुझसे ....
फिर ढूँढने लगती हूँ मैं
पागल- सी तुझको....
फिर खड़ी हो जाती हूँ
नीले आसमाँ के नीचे
पूछने को तुझको...
बड़ा तो तू था न ?????
ऐसे कैसे बड़ा कर गया तू मुझको????
क्यों बड़ा कर गया तू मुझको ????

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Friday, May 19, 2017

738

[ आज कमला निखुर्पा की बड़ी बिटिया विनीता का जन्मदिन है । यह कविता विश्व की सब माँओं की है। आज से 13 वर्ष पूर्व केन्द्रीय विद्यालय के प्रवक्ताओं के  21 दिवसीय प्रशिक्षण -कार्यशाला में केन्द्रीय विद्यालय  खमरिया जबलपुर में इस संवेदनशील कवयित्री से मिलने का सौभाग्य मिला। पाँच-छह राज्यों के शिक्षकों की भीड़ में चुपचाप कार्य में तल्लीन , सभी को पीछे छोड़ते हुए। तब कमला जी केन्द्रीय विद्यालय भीलवाड़ा में कार्यरत थीं।निर्मल मन का वह सूत्र आज तक मुझ जैसे अक्खड़ और और रूखे -से व्यक्ति को कसकर बाँधे है। बेटी डॉ विनीता के लिए हम सबकी कोटिश: शुभकामनाएँ !! ]
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तुम्हारी माँ
कमला निखुर्पा

आज ही के दिन 
ऑपरेशन की नीम बेहोशी से 
बाहर निकल 

कमला निखुर्पा

अपनी पलकों को खोलने की कोशिश कर रही थी
 कि
कोई मेरे कानों में धीरे से बोला- 
अपनी बिटिया को देखोगी?
एक नन्ही- सी परी
देखो इसके सर पे 
कितने काले-काले बाल 
सुनकर दर्द में भी मुस्करा दी थी मैं
काली-काली गोल आंखों को मटकाती 
हैरान- सी दुनिया को देखते हुए
हाथों की बंद मुट्ठी में 
अनगिन जादू की छड़ियाँ 
खुशियाँ छिपाए
आई मेरी गोद में 
भरा-भरा सा मेरा आँचल
पूर्णता का एहसास 
माँ बन जाने की गरिमा 
छुई मुई- सी
नन्हीं जान की झलक दिखा 
नर्स ले गई उसे अपने साथ
फिर कई दिनों तक जिन्दगी 
लड़ती रही मौत से  
जाने कितने ग्लूकोज 
खून की  बोतलों से 
बूँद- बूँद टपकती रही ज़िन्दगी
कभी होश में कभी नीम बेहोशी में 
डूबती उतराती रही जिंदगी।
नर्सों की भागदौड़
कानाफूसी 
डॉक्टरों की चिंता 
बिना कहे सब कह जाती थी
पर तुमको छोड़
कैसे जा सकती थी मैं
 मौत से दिन-रात लड़ती रही
साँसों की टूटती डोर को थामती रही।
पूरे पांच दिन और चार रातों के बाद 
फिर से तुम्हें
 बाहों में उठाया
जीवन जीने का एक नया
प्यारा सा मकसद पाया।
तब से अब तक 
जाने कितने दिवस बीते
कितनी रातें सपनीली
आज भी स्मृतियों में अंकित है
तुम्हारा अन्नप्राशन 
ढेर सारी चीजों के बीच
पहली बार में तुमने उठाई थी कलम 
हँसे थे हम।
आज भी याद है
पहली बार यूनिफ़ॉर्म पहनाकर 
तुमको स्कूल भेजना 
तुम्हारा टाटा कहकर जाना
खिलौनों में तुमको सबसे ज्यादा पसंद
डॉक्टर सेट और बार्बी डॉल।
वैसे तुम खेलती थी 
चींटियों के साथ 
कॉकरोच का ऑपरेशन भी कर डालती थी
डरावने कीड़े को पकड़
 अपनी छोटी बहन को डराना 
था तुम्हारा प्रिय शगल।
अपने सपनों के
महत्वाकांक्षाओं के बोझ को 
तुम्हारे बस्ते में डाल
रोज देखते रहे 
तुम्हे टाटा कहकर स्कूल जाते
खुश होते रहे।
डॉ विनीता
फिर एक दिन वो भी आया
सफेद लैब कोट पहने 
गले में स्थेटोस्कोप डाले
देखा तुमको
तुम जा रही थी डॉक्टरी पढ़ने 
उस दिन 
तुम्हारे पापा तुम्हे देख रहे थे
और हाथ जोड़ कर धीरे धीरे  कुछ कह रहे थे 
आभार प्रकट कर रहे होंगे ईश्वर का शायद ।
वर्षों बीते
अब नयन घट रीते
पर नहीं रीता
तुम्हारा प्यार ।
प्यारी बिटिया 
बढ़ती रहो 
कदम- दर -कदम।
सफल बनाओ जीवन 
शिक्षा के साथ संस्कारों 
के बीज बोना
शरीर की चिकित्सा के साथ
 मन के घाव भी भरना
संवेदना की बेल को 
कभी मुरझाने ना देना।
भावना के स्रोत को 
कभी सूखने ना देना।
सबसे गरीब 
सबसे दुखी
सबसे पीड़ित को ही
अपनी प्राथमिकता बनाना 
मानवता जो मर रही है धीरे-धीरे 
उसे अपनी चिकित्सा से नवजीवन देना। 

-(तुम्हारी माँ)

Tuesday, May 16, 2017

737

महाराणा प्रताप को समर्पित नेशन प्राइड अवार्ड
डॉ.सुषमा अतुल गुप्ता को

फिल्म जगत के विख्यात अभिनेता रजा मुराद जी ने रविवार, 14 मई 2017 को प्रात: 11 बजे गोल्डन मूमेंट्स, सेक्टर 12, करनाल  में महाराणा प्रताप जयंती समारोह में शामिल होकर, इस अवसर पर वह देश की 70 महान विभूतियों को नेशन प्राइड अवार्ड से सम्मानित किया।
सुकमा नक्सली हमले में शहीद हुए सोनीपत के  सपूत के परिजन, ओलंपिक विजेता योगेश्वर दत्त,
साहित्य एवं समाज सेवी प्रीति समकित सुराना आदि सहित अनेक कलाकार , एवं समाज सेवी शामिल हुए। कलर्स चैनल में शामिल बच्चों की टीम के शानदार प्रदर्शन और  गायक राजू पंजाबी के देश भक्ति गीत की प्रस्तुति सहित अतिथियों के उद्बोधन में विशेष तौर पर रजा मुराद का वक्तव्य प्रेरणास्पद रहा। तत्पश्चात डॉ सुषमा अतुल गुप्ता' सहित अन्य सभी प्रतिभागियों को रजा मुराद जी ने नेशन प्राइड अवार्ड से सम्मानित किया।

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रेनू सिंह की कविताएँ

1:धरित्री बन जाऊँगी ...
सूर्य  जो उदित हुआ
दुआओं से
उसकी रश्मियों को
सहलाया था।
गोद में रखकर
दुलारा था मैंने
बार -बार चूमा है
मेरे भीतर व्याप्त है
उसकी सिहरन
उसका प्रकाश ,
उन्मुक्त हो रही हूँ
मैं इस नेह से,
सहमी भी हूँ
कही अस्त न हो जा
बार -बार जकड़ लेना चाहती हूँ
बाहें फैला फैलाकर
ह्वान करती हूँ
आओ रश्मियों
नित -नूतन रूप में
समा जाओ मुझ में
मैं धरित्री  बन जाऊँगी
और धारिणी भी

सत्या शर्मा 'कीर्ति का पैन्सिल स्कैच

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2:रेत की नदी

उछलती,चहकती
उफनती,मचलती
प्रवाह के 
उन्नत -अवनत वेग,
बाँध बन गई
अचानक
बंदिशें,हिदायतें,
ठहरता प्रवाह
कसैला कर गया
तन-मन,
गोल -गोल डरी हुई
आँखें
सहमता  मन
सूखता अन्तर्मन
शून्य होती आँखें
बनने  लगी रेत.,
वो
भीतर ही भीतर,

एकरोज
पूरी की पूरी
रेत हो गई,
भीतर बहुत भीतर
टटोला,कुरेदा
जिंदा थे , ,
तरलता के चिह्न
कि
बहती थी कभी
प्रवाहमय
संगीतमय,लयमय,
ये
रेत की नदी
         
-0-      
रेनू सिंह.सेक्टर -4 बी, वसुन्धरा ,गाजियाबाद 

Monday, May 15, 2017

736

4-पुष्पा मेहरा
1

जनम दिया माँ ने हमें,पाला,लिया न मोल ।
 बल आशीषों का दिया,स्वार्थ तुला न तोल ।।
2
 नयन बरौनी -सी रहे,सदा हमारे साथ ।
 ऐसी माँ के चरण में,झुके सदा यह माथ ।।
3
 माँ की समता ना कहीं,वह बरगद की छाँव ।
 आशीषों की सघनता,मिलती उसके ठाँव ।।
4
शरबत बन कर ढल गई,माँ की कटु फटकार ।
भटका मन पथ पा गया,माँ का मिला दुलार ।।
5
माँ ने चिट्ठी में लिखा,मीठा -मीठा प्यार ।
पढ़-पढ़ आँखें तर हुईं,आखर थे रसधार ।।
6
मातृ दिवस में याद कर,फिर ना जाना भूल ।
वृद्धाश्रम में डाल उसे,भेंट न देना शूल ।।
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5- एक खास दिन
कमला घटाऔरा

माँ के लिये एक खास दिन
है चुन रखा पश्चिम ने कह -'मदर्स डे'
देते फूलों के गुलदस्ते और सोगातें
बच्चे से बड़े तक जुट जाते
माँ को अपना प्यार जताने
या फिर प्यार का फर्ज निभाते
उनके मन की वो ही जाने ।
हमारा तो हर दिन माँ के लि है
पूजनीया आराधनीया है ।
नित्य सुबह चरण स्पर्श कर
आशीर्वाद लेने का देवी रूपा जननी का ।
माँ चल दे जहाँ छोड़ के
पिता भी पिता नहीं रहता
बन जाता पराया ।
अफसोस है इतना
जाने क्यों ,
किस प्राप्ति की होड़ मे जुटकर
सन्तानें हमारी जमाने के संग चल पड़ी ।
छोड़ माँ -बाप को ।
माँ पीड़ा में जीती है ,
परवरि पा पैरों पर खड़े होते ही
क्यों बच्चों द्वारा भुलाई जाती है  ?
कटे बुढ़ापा रो -रो कर
पुरानी चीजों की तरह
क्यो ठुकराई जाती है ?
जो जन्म से माँ होती है
माँ बनते ही वह और महान हो जाती है
ममता के घन से घिर वह दिन रात
ममता रस बरसाती है
उसके त्याग , तपस्या , सेवा को भूल
क्यों बच्चों द्वारा झुठलाई जाती है ?
भूलते हैं क्यों, जिससे जन्म मिला
जिसके दम से यह जगत्
निरन्तर चल रहा
अमर बेल- सा बढ़ रहा
क्यों उसकी महत्ता बिसराई जाती है
काश ! सब को मिले वो आँख
हर बच्ची में देखे रूप माँ का
बुरी नियत से उसे छूने से पहले
जागे उसके अंदर का बच्चा
जिसने पय-पान किया माँ का
दुष्कर्म करने से पहले
आँख खोले यदि वह जाने
मन ही मन दुत्कारेगा खुद को
नहीं सूखने देगा नेह की पावन नदी को
औरों से बचाने हित दे दे जान अपनी
आगे मिलने वाली ठंडी छाँ को
भविष्य की माँ को ।
' निर्भय' नहीं  निर- भय हो कर जिए
जन्म ले आने से जाने तक वह
वृद्धावस्था में उसे सेवा और सत्कार मिले

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