Wednesday, November 30, 2016

693



1-नहीं होता  -डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर।


अश्कों का आजकल कोई दाम नहीं होता।
दिल टूट भी जातो कोहराम नहीं होता।।

परदेस में जाकर वो हो गया है निकम्मा ;
देश में आकर फिर उससे काम नहीं होता।।

बाट जोहते-जोहते माँ दिखती है पत्थर;
अखियों के नूर का अब पैगाम नहीं होता।।

विष बेल बीजकर लूट लिया अपना ही देश;
आतंकवादियों का कोई राम नहीं होता।।

भाषण देते और जो सिर्फ बातें ही करें ;
उन नेताओं सा और बदनाम नहीं होता।।

झकझोर दिया भारत की नस-नस को पाक ने;
बिना बात किसी का कत्लेआम नहीं होता।।

छीनते हैं जो औरों के मुँह से निवाला;
पूर्णिमामें उन लोगों का नाम नहीं होता।।

-0-
2-गीतिका- डॉ.पूर्णिमा राय,अमृतसर
दुनिया में सबका ही खून लाल होता है।
फिर भाई-भाई में क्यों बवाल होता है।।

खनक चंद सिक्कों की नित बढ़ती ही जाए;
माँ-बापू के रहते  इंतकाल होता है।।

बढ़ने लगी नफरतें मिटने लगा है प्यार ;
टूट रहे नाज़ुक रिश्ते मलाल होता है।।

जमाखोर करते देखो कंजूसी कितनी ;
जेब भरी नोटों से बुरा हाल होता है।।

अपने हाथ हुनर से जो जीतेगा दुनिया;
भारत माँ का सच्चा वही लाल होता है।।

भिखमंगों का जीवन देखो वे भी इन्साँ;
सुनो 'पूर्णिमा' उनका भी सवाल होता है।।

Monday, November 28, 2016

692



नन्हा भरतू  और भारतबन्द
डा कविता भट्ट
(दर्शन शास्त्र विभाग,हे०न० ब० गढ़वाल विश्वविद्यालय,श्रीनगर गढ़वाल उत्तराखंड)
सुबह से शाम तक, कूड़े से प्लास्टिक-खिलौने बीनता नन्हा भरतू
किसी कतार में नहीं लगता, चक्का जाम न भारत बंद करता है
दरवाजा है न छत उसकी वो बंद करे भी तो क्या
वो तो बस हर शाम की दाल-रोटी का प्रबंध करता है
पहले कुछ टिन-बोतलें चुन जो दाल खरीद लेता था
अब उसके लिए कई ग्राहकों को रजामंद करता है
बचपन से सपने बुनते- बैनर इश्तेहार बदलते रहे
गिरे बैनर तम्बू बना, सर्द रातों में मौत से जंग करता है
सड़क पर मिले चुनावी पन्नो के लिफाफे बनाकर
मूँगफली-सब्जी-राशन वालों से रोज अनुबंध करता है
कूड़े की जो बोरी नन्हे कंधे पर लटकते-लतकते फट ग
बस यही खजाना उसका, टाँके से उसके छेद बंद करता है
इतनी बोतलें- हड्डियाँ कूड़े में, यक्ष प्रश्न है- उसके जेहन में
बेहोशी-मदहोशी या नुक्कड़ की हवेली वाला आनंद करता है
निश्छल भरतू पूछ बैठा, कूड़े में नोट? आखिर क्या माजरा है?
तेरे सवाल का पैसा नहीं मिलना, अम्मा बोली- काहे दंद-फंद करता है ?
एक सवाल लाखों का उनका, तेरे से क्या उनकी क्या तुलना?
बापू तेरे बूढ़े हो गए हैं अब
उम्र ढली कूड़े में, तू क्यों अपना धंधा मंद करता है
इसीलिए नन्हा भरतू कूड़े, दाल और रोटी में ही खोया है
किसी कतार में नहीं लगता, चक्का जाम न भारत बंद करता है

Sunday, November 27, 2016

691



1-डॉ.भगवत शरण श्रीवास्तव
1
मोहन ने  मुरली  धरी,अधर मधुर ले हाथ          
यमुना जल विह्वल हुआ , कर लहरों से बात।
2
मोदी  की  धुन  गूँजती  चारों दिस में आज
भारत  जग पे छा गया  ,बन करके  सरताज।
3
मंजि़ल  पाने के लिए  ,करनी पड़ती  साध
जब तक  काँटा ना चुभे , बने न तब तक बात
4
जनता दुख से दूर हो ,तभी सफल है राज
सुख की छाया जब मिले ,सभी सफल तब काज ।
5
भरे पड़े गद्दार हैं , इन पर रखिए आँख
भारत का चोला पहन  ,करते ताक व झाँक ।
6
सदा घ्यान की  गंग में ,डूबो सौ -सौ  बार
नाम जपो जगदीश का ,लिख-लिख बारम्बार
-0-
2- डॉ.आशा पाण्डेय,कैंप,अमरावती
1
दिया जलाती लेखनी,  अक्षर-अक्षर तेल,
बाती बन लेखक जले, नहीं सरल यह खेल।
2
बच्चों की मुसकान से, ख़ुशी अधिक न कोय,
सुन्दरता झरने लगे,  गर दो दतुली होय ।
3
डाली कोयल कूकती, सुन हर्षाते लोग ,
जाने ना काहे लगा, कूकन का यह रोग ।
4
काश बीज ऐसा लगे, महके उसपर फूल ,
चढ़े देव के शीश पर, पर भूले ना मूल ।
5
मौन बड़ा मारक हुआ, शब्द हुए बेकार ,
मोटी पलकें हैं झुकीं, करती कड़ा प्रहार ॥
-0-
3-आभा सिंह
 1
अँगड़ाई लेने लगा, परिवर्तन का दौर,
मीठी- मीठी ठण्ड है, नहीं गरम को ठौर।
 2
गलियारे की धूप का, जाग गया जो गीत,
खिली- खिली तिदरी हुई, छज्जे लुढ़का शीत।
 3
नीर ताल का ठिर रहा, रहट रहा है ऊँघ,
नंगे पाँव हवा चले, झूमे सरसों सूँघ।
 4
कुहरे लिपटे खेत हैं, सीला सा परिवेश,
हरफ़ हरफ़ को पोंछकर, मेड़ पढ़े संदेश।
 5
ठंडा मौसम बेअदब, कँपा रहा बेभाव,
थोड़ी राहत दे रहा, जलता हुआ अलाव।
 6
छप्पर में भी छेद है, चादर में भी छेद,
जाड़ा निर्मोही हुआ, रहा हाड़ को भेद।
-0-

Friday, November 25, 2016

690



दोहावली
1-मंजूषा मन 
1
जीवन- विष का है असरनीले सारे अंग।
जिन जिनको अपना कहानिकले सभी भुजंग।
2
हमने तो बिन स्वार्थ केकिये सभी के काम।
हाथ मगर आया यहीमुफ़्त हुए बदनाम।।
3
सब अपने दुख से दुखीकौन बँधा धीर।
अपने -अपने दर्द हैंअपनी अपनी पीर।
4
थाम लिया पतवार खुद, चले सिंधु के पार।
मन में इक विश्वास ले, पाकिया मझधार।।
5
कहाँ छुपाकर हम रखें, तेरी ये तस्वीर।
भीग न जाए ये कहीं, आँखों में है नीर।।
6
मन भीतर रखते छुपा, है वो इक तस्वीर।
बस ये ही तस्वीर है, जीने की तदबीर।
-0-
2-राजपाल गुलिया
राजपाल गुलिया
1
हिम्मत जुटा वज़ीर ने , खरी कही जब बात
राजा की  शमशीर  ने , बतला दी औकात
2.
जिनके पुरखे राज के , थे  हुक्का बरदार
आज वही चौपाल पर , कर बैठे अधिकार ।
3.
झूठ सदा किसका चला , बता मुझे सरकार ।
चढ़ती   हाँडी   काठ  की , कहाँ दूसरी बार ।
 

4.
दर पर जब ललकारता , संयम तोड़ हुदूद ।
धीरज अरु संकोच का , करता खत्म वजूद ।
5.
इस बँगले को देखकर , मत हो  तू  हैरान ।
इसकी खातिर खेत ने , खो दी है पहचान ।
6.
बड़े निशानेबाज हो , करो नहीं ये चूक ।
रख कंधे पर गैर के  , चला  रहे   बंदूक ।
-0-
संपर्क सूत्र :-      राजकीय प्राथमिक पाठशाला भटेड़ा , . व जिला - झज्जर ( हरियाणा )-124108, मोबाइल #9416272973
RAJPAL GULIA <rajpalgulia1964@gmail.com>
-0-
3-ऋता शेखर 'मधु'
1
शेर, शिखी शतदल सभी, भारत की पहचान
प्राणों से प्यारा हमें,जन गन मन का गान।
2
लेखन में लेकर चलें, सूरज जैसा ओज
शीतल मन की चाँदनी, पूर्ण करे हर खोज
3
दुग्ध दन्त की ओट से, आई है मुस्कान
प्राची ने झट रच दिया, लाली भरा विहान
4
हरी दूब की ओस पर, बिछा स्वर्ण कालीन
 कोमल तलवों ने छुआ, नयन हुए शालीन
5
सूर्य कभी न चाँद बना, चाँद न बनता सूर्य
निज गुण के सब हैं धनी, बंसी हो या तूर्य
6
सुबह धूप सहला गई, चुप से मेरे बाल
जाने क्यों ऐसा लगा, माँ ने पूछा हाल
-0-
4-कृष्णा वर्मा, कैनेडा
1
संस्कार जब से मिटे ,मरा आपसी प्यार
निज आँगन हिस्से किए नफ़रत का व्यापार।
2
किसको अपराधी कहें , कौन करे नुकसान
आख़िर में माता-पिता ,करें सदा भुगतान।
3
धन-दौलत किस काम का, मारे जो मिठ बोल
बिना तेल बाती बिना ,क्या दीप का मोल।
4
बेटी बिन सूना लगे ,विरस तीज-त्योहार
सूना रहता आँगना ,नहीं प्यार मनुहार।
-0-
5-सविता अग्रवाल सवि,कैनेडा
1.
माँ की ममता का नहीं, जग में कोई तोल
बेटी बेटे लड़ रहे, लगा सके ना मोल ।
2
जमा जमा कर धन भरा, सुख पाया ना कोय
माया  तो  ठगनी  भई, समझ देर से होय ।
3
बार -बार तट छू रही, लहर ना माने हार
सदियों से है बढ़ रहा, तट लहरों में प्यार ।
4
बाती बटकर प्रेम की, भरो नेह का तेल
दीप जलाकर देख तू, सबसे होगा मेल ।
-0-